पारंपरिक तरीका छोड़ आधुनिकता की दौड़ में शामिल बैगा आदिवासी*
(शिवशंकर पाण्डेय जिला ब्यूरो)
बिरसा/बालाघाट।बैगा आदिवासी का नाम आते ही मन मे उत्सुकता आ जाती है,इनके रहन सहन,शादी ब्याह, खाने पीने,जन्म मरण आदि के तौरतरीकों की जानने की लालसा सभी को रहती है।गर्मी का मौसम शुरू हो गया है और बैगाओं में शादी ब्याह की शुरूआत भी हो गयी है
जिसमे पारंपरिक नगाड़े की जगह आधुनिक डीजे और मांडा की जगह पंडाल ने ले लिया है जो बैगाओं के आधुनिकता की दौड़ में शामिल होने का प्रमाण है।आज से दस साल पहले किसी भी बैगा कार्यक्रम में न तो डीजे होता था और न ही पंडाल और जनरेटर ।कोई भी कार्यक्रम हो तो बस दो नगाड़ा ही काफी होते थे जिसको रात दिन बजाया जाता था और सारे गांव वाले इसी के धुन पर नाचते थे।शादी ब्याह या कोई भी कार्यक्रम हो मद (शराब) का होना अतिआवश्यक है अगर मद नही तो कोई कार्यक्रम नही होता है।जन्म से लेकर मरण तक मे शराब यानी मद का होना नितांत आवश्यक होता है क्योंकि हर जगह मद को देवता को चढ़ाने यानी चुआने की परंपरा होती है जिसको समाज का ही( दोषी) यानी पंडा पुजारी करता है।
*आधुनिकता की दौड़ में शामिल होकर बेवजह के खर्चे में फंसते जा रहे है बैगा आदिवासी*
आधुनिकता की चकाचौंध से अपने आप को रोक नही पा रहे है बैगा आदिवासी,जिनको इसमें से निकालने की नितांत आवश्यकता है।नही तो इनकी वर्षों पुरानी सभ्यता भी धीरे धीरे लुप्त हो जाएगी और कुछ वर्ष बाद जिसको बचाने के लिए कई तरह के समितियां बनाई जाएगी।इसके पहले ही इनकी सभ्यता को बचाने का प्रयास करना चाहिए।जो शादी ब्याह या जन्म मरण 10 से 20 हजार मे हो जाता था अब वही कार्य 30 से 50 हजार के खर्च में जाता है जिससे बैगाओं के ऊपर कर्ज का बोझ बढ़ जाता है जिससे छुटकारा पाने के लिए इनको कभी कभी बंधुआ मजदूर भी बनना पड़ता है जो गलत है।फालतू के आडंबर से दूर रहकर इस परेशानी से बच सकते हैं व अपने समाज के तौर तरीकों को बचा भी सकते हैं।बहरहाल इस पर गहनता से विचार करने की आवश्यकता है जिस पर समाज के साथ प्रशासन को भी इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है।ः



















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