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Tuesday, March 8, 2022

गृहस्थ आश्रम भोग के लिये नहीं , भगवत्प्राप्ति के लिये है - झम्मन शास्त्री


गृहस्थ आश्रम भोग के लिये नहीं , भगवत्प्राप्ति के लिये है - झम्मन शास्त्री

अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट 

रायपुर -  प्रोफेसर कालोनी मे डा० तोयनिधि वैष्णव परिवार द्वारा आयोजित  भागवत कथा प्रसंग में सप्तम् दिवस के प्रवचन माला में कथाव्यास आचार्य पंडित झम्मन शास्त्री जी महाराज ने द्वारिका पुरी के लीलाओं का जीवंत वर्णन कर श्रोताओं को मुक्त करते हुये कहा भगवान श्री कृष्ण चंद्र की प्रत्येक लीलाओं से प्रेरणा संदेश लेकर जीवन में यथासंभव आत्मसात करने का प्रयास करें। गृहस्थ आश्रम में 16108 रानियों के मध्य रहते हुये भगवान की स्वर्ण की द्वारिका पुरी में 100 वर्षों तक विराजित रहकर भक्तों को शिक्षा प्रदान की संसार में रहते हुये राग महाशक्ति अहंकार को जीतने कृष्ण भक्ति का आसरा लेकर आप सदा सुखी प्रशन्न रह सकते हैं। धन्य है ये गृहस्थ आश्रम , अन्य तीन आश्रम की सेवा करना आसान है। यज्ञ , दान ,  पुंण्य , जप ,  तप , साधना सत्संग करते हुये मनुष्य जीवन के अंतिम लक्ष्य मोक्ष तक पहुंच जाता है। ध्यान रहे गृहस्थ आश्रम भोग के लिये नहीं भक्ती भगवान  प्राप्ति के लिये है। भगवान को पाने के लिये जन्म जन्मांतर से जीव तपस्या करते हैं और वक़्त आने पर प्रभु से साक्षात्कार हो जाता है यही रहस्य है भगवान को हम भी पति बना सकते हैं। प्रभु सब के परम पति है पति का तात्पर्य रक्षा करने वाले हैं परम संरक्षक है। भगवान परम भागवत भक्त सुदामा जी की कथा का चिंतन कराते हुये आचार्य श्री ने कहा पाने की चाह जब समाप्त हो जाता है निष्काम और नितिन विशेष भक्तों के पीछे भगवान दौड़ते है। सुदामा जी भगवान को मित्र भाव से बचते से उन्होंने शिक्षा गरीबी में अभाव में भी भगवत भक्ति विश्वास पूर्वक करते हुये वो धर्म का पालन करते रहे भगवान मिलेंगे भगवन को मित्र भाव से भजते थे। उन्होंने शिक्षा दी गरीबी में अभाव में भगवान के पास दुख को प्रकट मत करो वे सभी भक्तों के हृदय के भावों को जानते हैं। भगवान से मिलने की अभिलाषा को निरंतर बढ़ाते रहो तो भगवत कृपा रास्ता से सुलभ हो जाता है। सुख का दिन आये तो भगवत आराधना उपासना में मन को अधिक लगाने का प्रयास करना चाहिये। देखा यही जाता है लोग विपत्ति में भगवान से कष्ट सुनाते हैं संकट निवारण होने पर भूल जाते हैं।  आचार्य श्री ने सातवें दिन की कथा प्रसंग कृष्ण उद्धव संवाद की कथा मार्मिक शैली में बताते हुये कहा जिससे ज्ञान मिले , शिक्षा मिले , अच्छाई को जीवन मे ग्रहण करो और बुराई को त्याग दो। हमारा जीवन दोष दुर्गुणों बुराइयों से दूर हो सदाचार संयम से पूर्ण जीवन होने पर ही आत्मा कल्याण संभव है। दत्तात्रेय जी के 24 गुणों का वर्णन करते हुये आचार्य श्री  ने बताया कि साधना के लिये दीक्षा गुरु एक होना चाहिये जो परमार्थ पथ में साधना के लिये मार्गदर्शन करें। नारायण से ब्रह्मा , ब्रह्मा से वशिष्ठ , वशिष्ठ से शक्ति , शक्ति से परासर , परासर से व्यास ,  व्यास से सुकदेव फिर गौड़ ,  पादाचार्य फिर गोविंद पाद् जी ,  शंकराचार्य भगवान हमारी गुरु परंपरा है। परंपरा प्राप्त व्यास जी से दीक्षित कर्म जीवन में साधना करें तो मनुष्य जीवन को आप सार्थक बना सकते हैं। भगवत कथा सुनकर महाराज परीक्षित साक्षात प्रभु के धाम वैकुंठ लोक के लिये विमान में प्रस्थान किया दिव्य शास्त्र भागवत है जो मोक्ष देने की घोषणा करती है।

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