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Friday, January 6, 2023

बड़ी धूमधाम से मनाया गया रतनपुर मे छेरछेरा त्यौहार

 बड़ी धूमधाम से मनाया गया रतनपुर मे छेरछेरा त्यौहार



रतनपुर से ताहिर अली की रिपोट



रतनपुर....छत्तीसगढ़ी बोली और भाषा में त्यौहार को तिहार बोला जाता है और आज भी ग्रामीण ईलाकों में जो ठेठ छत्तीसगढ़ीया अंदाज लिए हुए है वे त्यौहारों को तिहार के रूप में ही संबोधित करते हैं । छेरछेरा को हर्ष और खुशी के त्यौहार के रूप में जाना और मनाया जाता है ।छेरछेरा एक शुद्ध और पारंपरिक रूप से छत्तीसगढ़ का अपना तिहार है और इसीलिए प्रदेश सरकार भी आज के दिन शासकीय अवकाश घोषित करती है । लेकिन छेरछेरा का  तिहार है क्या ? क्या सिर्फ टोली बना कर घर घर से धान और चांवल मांगना ? या कुछ और ? आखिर इस तिहार के पिछे का इतिहास क्या है ? और ऐसा क्या है कि आज के दिन लोगों को घर घर मांगने में झिझक भी नहीं होती ? हर वर्ष पुष माह की पूर्णिमा को ये तिहार मनाया जाता है । इसी समय गांव गांव में डंडा नृत्य खेलते लोग नजर आते हैं और बच्चों की टोली घर घर ‘छेर छेरा कोठी के धान ला हेरते हेरा की आवाज के साथ अनाज मांगती है और शायद ही गांव का कोई घर हो जो इन्हें खाली हाथ लौटाता हो ।लोक परंपरा के अनुसार पौष महीने की पूर्णिमा को प्रतिवर्ष छेरछेरा का त्योहार मनाया जाता है। गाँव के युवक घर-घर जाकर डंडा नृत्य करते हैं और अन्न का दान माँगते हैं। धान मिंसाई हो जाने के चलते गाँव में घर-घर धान का भंडार होता है, जिसके चलते लोग छेर छेरा माँगने वालों को दान करते हैं।यदि पौराणिक कथा के अनुसार जाना जाए तो एक समय पृथ्वी में भारी अकाल पड़ा लोगों के पास अनाज की कमी हो गई तो  भगवान शंकर ने माता दुर्गा से भिक्षा मांगी थी वो दिन आज ही का थ ।   मां दुर्गा ने पृथ्वी के लोगों को भारी खाद्य संकट से बचाने के लिए मां शाकंभरी के रूप में अवतार लिया था इसलिए इन्हे सब्जियों और फलों की देवी के रूप में भी पूजा जाता है । और आज ही के दिन मां शाकंभरी जयंती भी मनाई जाती है ।यदि इतिहास में झांका जाए तो  इस त्यौहार का संबंध रतनपुर राजवंश से जुड़ा मिलता है । रतनपुर छत्तीसगढ़ की राजधानी भी थी और यहां कलचुरी राजवंश का राज चलता था । बाबू रेवाराम की पांडुलिपियों से पता चलता है कि कलचुरी राजवंश और मण्डल के राजा बीच विवाद चल रहा था ।   कोसल नरेश “कल्याण साय” व मण्डला के राजा के बीच विवाद हुआ, और इसके पश्चात तत्कालीन मुगल शासक अकबर ने उन्हें दिल्ली बुलावा लिया। कल्याणसाय 8 वर्षाे तक दिल्ली में रहे, वहाँ उन्होंने राजनीति व युद्धकाल की शिक्षा ली और निपुणता हासिल की।8 वर्ष बाद कल्याणसाय, उपाधि एवं राजा के पूर्ण अधिकार के साथ अपनी राजधानी रतनपुर वापस पंहुचे। जब प्रजा को राजा के लौटने की खबर मिली, प्रजा पूरे जश्न के साथ राजा के स्वगात में राजधानी रतनपुर आ पहुँची। प्रजा के इस प्रेम को देख कर रानी फुलकेना द्वारा रत्न और स्वर्ण मुद्राओ की बारिश करवाई गई और रानी ने प्रजा को हर वर्ष उस तिथि पर आने का न्योता दिया। तभी से राजा के उस आगमन को यादगार बनाने के लिए छेरछेरा पर्व  की शुरुवात की गई। राजा जब घर आये तब समय ऐसा था, जब किसान की फसल भी खलिहानों से घर को आई, और इस तरह जश्न में हमारे खेत और खलिहान भी जुड़ गए।

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