पत्रकारिता में बढ़ती चाटुकारिता
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आलेख ----कमलेश प्रसाद शर्माबाबू
पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है।पत्रकारिता किसी भी जाति या मजहब से परे होता है।ये समाज के दबे कुचले उपेक्षित वर्ग की आवाज होता है।उसका प्रतिनिधी होता है। देश दुनिया में घटने वाली प्रत्येक घटना पर इनकी पैनी नजर होती है हर घटनाओं से हमें रुबरु कराता है।और साथ ही हमें अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सचेत भी करता है।
एक सच्चा पत्रकार न कभी झुकता है,न कभी रुकता है और न कभी बिकता है। जिस तरह साहित्य समाज का दर्पण होता है उसी तरह पत्रकार भी पब्लिक का प्रतिनिधी होता है। लेकिन आज बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि कई पत्रकार किसी समाज या ब्यक्ति की रहनुमा कहलाने वाली चाटुकारिता फोबिया बिमारी से ग्रसित हो चुके हैं।वे किसी समाज के मसीहा बनने के चक्कर में चाटुकार बन गये हैं।यहाँ तक कि वे समय-समय पर एक नया इतिहास दिखाने का कुत्सित प्रयास भी करते रहते हैं।
"न खाता न बही मैं कहूँ वही सहीं" के सिद्धांत पर चलते हुए अपना विकृत विचार पाठकों पर थोपने का मदारी खेल खेलते रहता है।
पत्रकारिता स्वीकार्यता हो चाटुकारिता नही।उसकी भाषा जनहितैषी हो,शुद्ध हो, सुचितापूर्ण हो,निष्पक्ष हो पर अफसोस आज की पत्रकारिता में हमे विरले ही यह देखने को मिलता है। आज देखने में आ रहा है कि मीडिया राजनीतिक दलों की दासी बनती जा रही है। चंद तत्कालिक सुखोपभोग के लिए मीडिया कर्मियों ने अपना ईमान,धर्म गिरवी रख दिया है और यह कहूँ तो कोई अतिशयोक्ति नही कि कुछ लोगों ने बेच भी दिया है। हालाकि प्रिंट मीडिया में कुछ मर्यादा अभी भी बची हुई है पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने तो सारी हदें पार कर दी हैं। चाटुकारिता के मामले में एक दूसरे को पछाड़ने की होड़ लगी हुई है।इसका स्तर आज इतना नीचे गिर गया है कि वे एक-दूसरे के लिए गोदी मीडिया जैसे शब्दों का प्रयोग स्वयं कर रहें हैं।कुछ पत्र पत्रिकाओं और अखबारों के सम्पादक भी इनसे अछूते नही हैं, तो कुछ समाज के आँखो में धूल झोंकने वाले तथाकथित साहित्यकार भी इसमें शामिल है।जो साहित्य में समाज का दर्पण नही मात्र अपनी जाति बिरादरी का दर्शन करा रहे हैं।कलम में वो ताकत होती है जो दुनिया को एक सच्चा इतिहास भी दिखाता है तो एक गलत इतिहास भी लिखकर दे सकता है।
यदि समय रहते इनकी सही दिशा और दशा पर चिंतन नही किया गया तो एक गलत परंपरा और इतिहास अपनी आने वाली पीढ़ी को सौंपने का उत्तरदायी हम स्वयं होंगे।जिस तरह उचित समय पर सहीं उपचार न होने से एक छोटा सा पिरकी बड़ा घाव बन जाता है उसी तरह उचित समय पर इस पर लगाम नही लगाया गया तो पत्रकारिता अपना सम्मान खो देगी।जो इसके लोकतंत्र के रूप में चोथे स्तंभ का आधिपत्य भी छीन लेगी।चौथे स्तंभ के रूप में स्थापित होने की मंशा पर पानी फिर जायेगा और ये लोकतंत्र के लिए यह बहुत बड़ी विडंबना होगी।
आज रातोरात हीरो बनने के लिए लोग लालायित हैं।एक मैच में कोई अच्छा चौका छक्का ठोंक दिया तो एक रात में स्टार बन जाता है।एक फिल्म में दो-तीन आइटम सांग करके एक नकचढ़ी हिरोइन सबके दिलों में राज करने लग जाती है वैसा ही एक पत्रकार किसी बड़ी हस्ती का कृपापात्र होकर रातों-रात स्टार बन जाता है या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एक नया मुर्गा लड़ाई कराकर इसे दो साड़ों की लड़ाई में तब्दील कर देता है।इनको अपनी जोर-जोर से आवाज से प्रभावित करके एक-दूसरे को तू-तू मैं-मैं कराने में इन्हीं का बड़ा हाथ होता है।ये अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए डिबेट में आये लोगो को भरपूर नमकीन व चटकदार खाने परोसते हैं ताकि उनका बी.पी.बढ़ जाय और एक-दूसरे से कसके लड़ें और मल्ल युद्ध के लिए ललकारें। युद्ध केवल शरीर से नहीं भाषा से भी लड़ा जा सकता है और आज ये लोग अपना यही एजेंडा चला रहे हैं। एक-दूसरे के लिए स्तरहीन भाषा का प्रयोग गाली गलौज तक पहुंँच जाता है।हाथा पाई और बीच डिबेट को छोड़कर भागना भी पड़ जाता है। फिर क्या पूछो चैनल, पत्रकार रातों-रात स्टार बन जाते हैं।
आज लोग रातोरात स्टार बनना चाहते हैं शार्टकट अपनाकर कम समय में ऊँचा मुकाम हासिल करना चाहते हैं कंगूरा तो सभी लोग बनना चाहते हैं पर नींव कोई नही बनना चाहता।
इस संबंध में हमारे साथी छत्तीसगढ़ी साहित्यकार रामकुमार साहू जी ने एक बहुत सुंदर कविता लिखी है -
दिया बने बर सबो सधाये
बाती बनके जरही कोन।
कमलेश प्रसाद शर्माबाबू
कटंगी-गंडई
जिला केसीजी छत्तीसगढ़
9977533375


















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