धूमधाम से मनाया गया देवउठनी एकादशी पर्व
अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
रायपुर - राजधानी सहित आसपास के शहरों और गांँवों में देवउठनी एकादशी का पर्व धूमधाम व भक्तिभाव के साथ मनाया गया। घरों , मंदिरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में चाँवल आटे से चौक एवं रंगोली बनाये गये। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने अपने - अपने घरों में तुलसी चौरे पर गन्ने के मंडप तैयार कर तुलसी को दुल्हन की तरह सजाया और विधिपूर्वक षोडशोपचार पूजन और तुलसी माता को सुहाग सामाग्री भेंटकर परिवार के सुख समृद्धि की कामना की। इसके पश्चात पारंपरिक ढंग से शालिग्राम के साथ माता तुलसी का विवाह कराया। अनेक स्थानों पर महिलाओं ने माता तुलसी के समक्ष विवाह रश्मों के गीतों का गायन किया। कई श्रद्धालुओं ने निर्जला तो कई लोगों ने पेय पदार्थों पर उपवास रखा। इसके पहले बाजारों में पूजन सामग्री , शादी ब्याह के सामान खरीदने वालों की भीड़ थी। लोग इस पर्व के लिये गन्ना, सहित पूजन और सोलह श्रृँगार के सामान खरीदते नजर आये। वहीं व्यवसायिक स्थानों पर भी दीप प्रज्वलित किये गये , मंदिरों में भी श्रद्धालुओं ने दीप प्रज्वलित कर देव वंदना की। इसी कड़ी में धर्मनगरी चाम्पा ब्राह्मणपारा में विश्व के सबसे बड़े गो सेवार्थ संगठन कामधेनु सेना के छग प्रदेश सचिव शिखा चैतन्य द्विवेदी ने भी देवउठनी एकादशी पर्व पर माता तुलसी और भगवान विष्णु का षोडशोपचार पूजा अर्चना की।
शुभ कार्य होंगे शुरू
देवउठनी एकादशी के अवसर पर तुलसी ब्याह के साथ ही शुभ कार्यों पर लगा चार माह का विराम समाप्त हो गया। देवउठनी एकादशी में देवताओं के जागने के साथ ही शादी , गृहप्रवेश , मुंडन संस्कार आदि मांगलिक कार्य हिंदू धर्म में शुरू हो जाती है। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को भगवान विष्णु चार माह के लिये क्षीरसागर में शयन करते हैं। भगवान के शयन के दौरान चार माह तक मांगलिक कार्य वर्जित रहते हैं। चार माह तक शयन करने के बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के एकादशी को भगवान विष्णु जागते हैं और इसके बाद मांगलिक कार्य भी शुरू हो जाते हैं। जो मनुष्य तुलसीजी का विवाह भगवान विष्णु से करते हैं , उनके इस जन्म व पिछले जन्म के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।


















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