परशुराम भवन में धूमधाम से मनाया गया आंवला नवमी महोत्सव
अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
जांजगीर चाम्पा - प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी कोसा , कांसा एवं कंचन की नगरी के हृदय स्थल में निर्मित भगवान परशुराम ब्राह्मण समाज भवन में आज बड़ी संख्या में कार्तिक स्नान कर महिलाओं ने आंवला नवमी उत्सव भारतीय व सनातन संस्कृति के अनुरुप धूमधाम से मनाया और परिवार में सुख-समृद्धि की कामना की। यहां महिलाओं ने आंवला वृक्ष को स्नान करा कर चंदन , रोली , पुष्प आदि से श्रृंगार कर पूजा अर्चना किया और फिर घी के दीपक जलाकर आंवला वृक्ष की परिक्रमा करके संतान , परिवार में सुख समृद्धि की कामना की। षोडशोपचार पूजन पश्चात आंवला भोज आयोजित कर सभी ने आंवला पेड़ की छांव में बैठकर भोजन प्रसाद ग्रहण किया। इसमें शामिल होने आसपास के क्षेत्र एवं दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचे हुये थे। इस अवसर पर पद्मा शर्मा , अनुभा शर्मा , प्रेमलता पाण्डेय , रजनी पाठक , संगीता तिवारी , राजश्री दीवान , इन्द्राणी शर्मा , सुनीता दीवान , शैल तिवारी , निशा पाण्डेय , वंदना शर्मा , वंदना पाण्डेय और अम्बे शर्मा विशेष रूप से उपस्थित थीं। इसके अलावा महिलाओं ने पूरे परिवार के साथ अपने - अपने घरों में पुरोहित से अक्षय नवमी की कथा व आंवला वृक्ष के महत्व का श्रवण किया। जिसमें बताया गया कि धार्मिक दृष्टि से कार्तिक मास की इस नवमी तिथि का महत्व अक्षय तृतीया से कम नहीं है। कहते हैं जो लोग दिपावली पर भगवान विष्णु व देवी लक्ष्मी की कृपा पाने से वंचित रह गये , उनके लिये अक्षय नवमी एक बड़ा मौका होता है। इसमें आंवले पेड़ की पूजा करनी होती है और प्रसाद रूप में आंवला लक्ष्मी नारायण को अर्पित करना होता है। वहीं आंवला नवमीं के बारे में विस्तृत प्रकाश डालते हुये पुरी शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वतीजी महाराज के कृपापात्र शिष्य पं० पद्मेश शर्मा ने अरविन्द तिवारी को बताया कि अक्षय नवमी या आंवला नवमी का पर्व के दिन आंवले के वृक्ष की पूजा करने के बाद वृक्ष के नीचे बैठकर भोजन करने से भगवान विष्णु और भगवान शिव का आशीर्वादि मिलता है , जिससे घर में धन , संपत्ति , यश , वैभव , अच्छा स्वास्थ्य व सम्मान आता है। ऐसे में इस पर्व को हमारे संगठन में भी बड़े भक्तिभाव व आस्था से मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन किये जाने वाले दान का पुण्य कभी क्षय नहीं होता। मान्यता है कि कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी से पूर्णिमा तिथि तक भगवान नारायण आंवला के पेड़ पर निवास करते हैं , इसलिये इस दिन आंवला के पेड़ की पूजा होती है। यह प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का भारतीय संस्कृति का पर्व है क्योंकि आंवला पूजन पर्यावरण के महत्व को दर्शाता है और इसके प्रति हमें जागरूक भी करता है। पं० शर्मा ने धार्मिक ग्रंथों में आंवले का महत्व के बारे में बताया कि पद्म पुराण के अनुसार यह पवित्र फल भगवान श्री विष्णु को प्रसन्न करने वाला और शुभ माना गया है। इसे खाने मात्र से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाते हैं। आंवला खाने से आयु बढ़ती है। उसका रस पीने से धर्म संचय होता है और उसके जल से स्नान करने से दरित्रता दूर होती है और हर तरह का ऐश्वर्य प्राप्त होता है। आंवले के दर्शन, स्पर्श और उसके नाम का उच्चारण करने से वरदायक भगवान श्री विष्णु अनुकूल हो जाते हैं। जहां आंवले का फल मौजूद होता है, वहां भगवान श्री विष्णु सदा विराजमान रहते हैं और उस घर में ब्रह्मा एवं सुस्थिर लक्ष्मी का वास होता है , इसलिये अपने घर में आंवला जरूर रखना चाहिये।
आंवला नवमीं कथा -
मान्यता है कि एक बार देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण कर रही थीं। उनकी इच्छा हुई कि कैसे भगवान विष्णु और शिव को एक साथ पूजा की जाये। तभी उन्हें ध्यान आया कि विष्णु को तुलसी प्रिय है और शिव को बेल और इन दोनों के गुण एक साथ आंवले में हैं। लक्ष्मी ने आंवले के वृक्ष को विष्णु और शिव का प्रतीक मानकर उसकी पूजा की। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर विष्णु और शिव प्रकट हुये। माता लक्ष्मी ने आंवले के पेड़ के नीचे उन्हें भोजन कराया और उसके बाद स्वयं भोजन को प्रसाद रूप में ग्रहण किया। उस दिन से ही यह तिथि आंवला नवमी के नाम से प्रसिद्ध हुईं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा , आंवले पानी से स्नान , आंवले को खाने और आंवले का दान करने से अक्षय पुण्य मिलता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन की गई पूजा-अर्चना और दान का अक्षय फल मिलता है , इसलिये इसे अक्षय नवमी भी कहा जाता है। आंवला नवमी के दिन ही भगवान श्रीकृष्ण ने कंस के आमंत्रण पर वृंदावन छोड़कर मथुरा की ओर प्रस्थान किया था।


















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