महानवमी आज
हिंदू धर्म में अष्टमी -नवमी पर कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है,मान्यता है कि कन्याएं स्वयं मां दुर्गा का स्वरूप होती हैं ।
सी एन आइ न्यूज-पुरुषोत्तम जोशी।
शारदीय नवरात्रि समाप्ति की ओर है। यह पावन पर्व महानवमी के दिन कन्या पूजन के साथ संपन्न होगा और इसके अगले दिन पूरे उल्लास और श्रद्धा के साथ विजयदशमी मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक नवरात्रि की अष्टमी और नवमी तिथियों पर कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है। इस दिन घरों में कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर पूजन जाता है और उनके लिए भोज का आयोजन किया जाता है। इससे मां दुर्गा के साथ-साथ सभी देवी-देवताओं की कृपा भी जीवन पर बनी रहती है। यही नहीं कन्या पूजन के प्रभाव से घर-परिवार में समृद्धि, सुख-शांति और सौभाग्य का वास भी होता है। इस वर्ष महानवमी 1 अक्तूबर 2025 को मनाई जाएगी। इस दिन देशभर के देवी मंदिरों में भव्य अनुष्ठान, कन्या पूजन और महाआरती का आयोजन किया जाता है।
कन्या पूजन शुभ मुहूर्त-
• नवमी तिथि पर कन्या पूजन सुबह 4 बजकर 53 मिनट से 5 बजकर 41 मिनट तक कर सकते हैं।
नवमी तिथि
इस साल 30 सितंबर 2025 को शाम 6 बजकर 6 मिनट से नवमी तिथि की शुरुआत होगी। इसका समापन 1 अक्तूबर को शाम में 7 बजकर 2 मिनट पर होगा। ऐसे में महानवमी 1 अक्तूबर 2025 को मान्य होगी।
शुभ संयोग
महानवमी पर पूर्वाषाढा नक्षत्र बन रहा है, जो सुबह 8 बजकर 6 मिनट तक रहेगा। इसके बाद उत्तराषाढा नक्षत्र का संयोग बनेगा। हालांकि, इस तिथि पर अतिगण्ड योग रहेगा। ज्योतिष दृष्टि से भी यह तिथि खास है। इस दिन सूर्य और बुध के कन्या राशि में होने से बुधादित्य योग बन रहा है।
• मान्यता है कि कन्या पूजन में 2 से 10 वर्ष तक की कन्याओं को शामिल करना चाहिए।
• माना जाता है कि कन्या भोज से पहले उनके चरण धोकर उनका आदर करना चाहिए। इससे देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
•धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक कन्या पूजन में हमेशा 9 कन्याएं बैठानी चाहिए। हालांकि, आप इससे अधिक और 3, 5 या 7 कन्याओं को भी भोजन करा सकती हैं।
• कन्या पूजन में एक लड़के को भी अवश्य भोजन करना चाहिए, जिसे बटुक भैरव भी कहा जाता है। मान्यता है कि यह बहुत शुभ होता है और घर में सुख-समृद्धि आती है।
कन्या पूजन में हलवा, पूरी, काले चने को अवश्य शामिल करें और अंत में उन्हें कुछ उपहार या रूपये देकर आशीर्वाद लें।,
महानवमी केवल नवरात्रि का नौवाँ दिन ही नहीं है; यह आध्यात्मिक पूर्णता का भी प्रतीक है। भक्तों का मानना है कि देवी के पूर्व आठ स्वरूपों - शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि और महागौरी - की पूजा करने के बाद, यह यात्रा माँ सिद्धिदात्री के साथ समाप्त होती है।
यह दिन इस बात का प्रतीक है कि पिछले आठ दिनों की प्रार्थनाएँ और व्रत महानवमी पर अपने चरम पर पहुँचते हैं। यह दिन राक्षस महिषासुर पर देवी दुर्गा की अंतिम विजय का प्रतीक है। इस दिन माँ सिद्धिदात्री अपने भक्तों को आध्यात्मिक ज्ञान, शक्ति और दिव्य शक्तियाँ प्रदान करती हैं। यह नवरात्रि के समापन का भी प्रतीक है।


















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