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Wednesday, October 29, 2025

छठ महापर्व,जिसमें राजा और रंक एक घाट पर माथा टेकते हैं ,एक देवता को अर्ध्य देते हैं और एक बराबर आशीर्वाद पाते हैं।

 छठ महापर्व,जिसमें राजा और रंक एक घाट पर माथा टेकते हैं ,एक देवता को अर्ध्य देते हैं और एक बराबर आशीर्वाद  पाते हैं। 




सी एन आइ न्यूज-पुरुषोत्तम जोशी। 

   Chath MahaParva -जब विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता की स्त्रियां अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ सज-धज कर अपने आंचल में फल ले कर निकलती हैं तो लगता है जैसे संस्कृति स्वयं समय को चुनौती देती हुई कह रही हो, 



"देखो! तुम्हारे असंख्य झंझावातों को सहन करने के बाद भी हमारा वैभव कम नहीं हुआ है,हम सनातन हैं,हम भारत हैं।हम तबसे हैं जबसे तुम हो और जबतक तुम रहोगे तबतक हम भी रहेंगे।"




जब घुटने भर जल में खड़ी व्रती की सूपली में बालक सूर्य की किरणें उतरती हैं तो लगता है जैसे स्वयं सूर्य बालक बन कर उसकी गोद में खेलने उतरे हैं।स्त्री का सबसे भव्य,सबसे वैभवशाली स्वरूप वही है।




इस धरा को "भारत माता" कहने वाले बुजुर्ग के मन में स्त्री का यही स्वरूप रहा होगा।कभी ध्यान से देखिएगा छठ के दिन जल में खड़े हो कर सूर्य को अर्घ्य दे रही किसी स्त्री को,आपके मन में मोह नहीं श्रद्धा उपजेगी।




छठ वह प्राचीन पर्व है जिसमें राजा और रंक एक घाट पर माथा टेकते हैं,एक देवता को अर्घ्य देते हैं और एक बराबर आशीर्वाद पाते हैं।धन और पद का लोभ मनुष्य को मनुष्य से दूर करता है, पर धर्म उन्हें साथ लाता है।अपने धर्म के साथ होने का सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि आप अपने समस्त पुरुखों के आशीर्वाद की छाया में होते हैं।छठ के दिन नाक से माथे तक सिंदूर(पटमासा) लगा कर घाट पर बैठी स्त्री अपनी हजारों पीढ़ी की अजिया सास,ननिया सास की छाया में होती है,बल्कि वह उन्हीं का स्वरूप होती है।उसके चंगेरी (दउरे) में केवल फल नहीं होते,समूची प्रकृति होती है।वह एक सामान्य स्त्री सी नहीं,अन्नपूर्णा सी दिखाई देती है।

ध्यान से देखिए आपको उनमें कौशल्या दिखेंगी,उनमें मैत्रेयी दिखेंगी,उनमें सीता दिखेगी,उनमें लोपामुद्रा दिखेंगी,उनमें गार्गी दिखेंगी,उनमें अनुसुइया दिखेंगी,सावित्री दिखेंगी... उनमें पद्मावती दिखेंगी, उनमें लक्ष्मीबाई दिखेंगी,उनमें भारत माता दिखेंगी।

इसमें कोई संदेह नहीं कि उनके आंचल में बंध कर ही यह सभ्यता अगले हजारों वर्षों का सफर तय कर लेगी।

छठ डूबते सूर्य की आराधना का पर्व है।डूबता सूर्य इतिहास होता है और कोई भी सभ्यता तभी दीर्घजीवी होती है जब वह अपने इतिहास को पूजे।अपने इतिहास के समस्त योद्धाओं को पूजे और इतिहास में अपने विरुद्ध हुए सारे आक्रमणों और षडयंत्रों को याद रखे।

छठ उगते सूर्य की आराधना का पर्व है।उगता सूर्य भविष्य होता है और किसी भी सभ्यता के यशश्वी होने के लिए आवश्यक है कि वह अपने भविष्य को पूजा जैसी श्रद्धा और निष्ठा से संवारे... हमारी आज की पीढ़ी यही करने में चूक रही है,पर उसे यह करना ही होगा-यही छठ व्रत का मूल भाव है,

मैं खुश होता हूं घाट पर स्त्रियों को देख कर,मैं खुश होता हूं उनके लिए राह बुहारते पुरुषों को देख कर,मैं खुश होता हूं उत्साह से लबरेज बच्चों को देख कर... सच पूछिए तो यह मेरी खुशी नहीं,मेरी मिट्टी,मेरे देश,मेरी सभ्यता की खुशी है।

मेरे देश की माताओं!कल आज आदित्य आपकी सुपली में उतरें तो उनसे कहिएगा कि इस देश,इस संस्कृति पर अपनी कृपा बनाये रखें,ताकि हजारों वर्ष बाद भी हमारी पुत्रवधुएं यूं ही सज-धज कर  जल में खड़ी हों और कहें- "उगs हो सुरुज देव, भेल अरघ के बेर...

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