बीजापुर छत्तीसगढ़।
डिजिटल इंडिया और बदलता हुआ गाँव
डॉ. संजय कुमार यादव, सहायक प्रोफेसर ( डिजिटल मार्केटिंग एवं उपभोक्ता मनोविज्ञान -शैक्षिक विशेषज्ञ)
लगभग 30 साल पहले जिस गाँव में हम रहते थे, वह सादगी, अपनापन और प्रकृति की सुंदरता से भरा हुआ था। आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो लगता है कि वे दिन एक सुंदर याद बनकर इतिहास में बदल गए हैं। गाँव के चारों ओर फैले पेड़-पौधे, पुराने कच्चे-पक्के घर, खुले मैदान और गलियों में गूंजती बच्चों की हंसी – सब कुछ जीवन से भरा हुआ था।
उस समय बच्चों का सबसे बड़ा मनोरंजन गिल्ली-डंडा और कबड्डी जैसे पारंपरिक खेल हुआ करते थे। शाम होते ही बच्चे मैदानों और गलियों में इकट्ठा हो जाते थे और खेलते-खेलते समय का पता ही नहीं चलता था। गाँव के बड़े-बुजुर्ग पेड़ों की छाँव में बैठकर बातें करते थे, और आपस में खुशियाँ और दुख बाँटते थे। त्योहारों में पूरा गाँव एक परिवार की तरह एक साथ मिलकर खुशियाँ मनाता था।
धीरे-धीरे समय आगे बढ़ता गया और दुनिया बदलने लगी। तकनीक ने हमारे जीवन में प्रवेश किया। मोबाइल फोन और इंटरनेट का उपयोग बढ़ने लगा। जो बच्चे पहले मैदान में खेलते थे, वे धीरे-धीरे मोबाइल की दुनिया में सिमटने लगे। गिल्ली-डंडा और कबड्डी के खेल कम होते गए, और गाँव की चहल-पहल भी पहले जैसी नहीं रही।
जो यादें कभी खुले मैदानों और गलियों में बसी हुई थीं, वे अब मोबाइल के फोटो और वीडियो में सिमटती चली गईं। पुराने घरों की जगह नए मकानों ने ले ली, और गाँव का रूप भी धीरे-धीरे बदलने लगा।
इसी बदलाव के दौर में Digital India की शुरुआत हुई, जिसने गाँवों के विकास में एक नई दिशा दी। इंटरनेट, ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल भुगतान और सरकारी सेवाओं की ऑनलाइन सुविधा ने ग्रामीण जीवन को नई संभावनाओं से जोड़ दिया।
आज गाँव का स्वरूप बदलकर डिजिटल गाँव के रूप में दिखाई देने लगा है। बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे हैं, किसान मोबाइल पर मौसम और फसलों के दाम की जानकारी ले रहे हैं, और लोग डिजिटल भुगतान प्रणालियों जैसे Unified Payments Interface के माध्यम से आसानी से लेन-देन कर रहे हैं।
हालाँकि पेड़-पौधों की छाँव में बीते वे दिन, गिल्ली-डंडा और कबड्डी के खेल, और पुराने घरों की यादें अब इतिहास बन चुकी हैं, लेकिन वे हमारे दिलों में आज भी जीवित हैं


















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