लोक-परलोक के भोगों से विरक्ति ही वास्तविक सन्यास है - अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती
अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
वाराणसी - काशी स्थित श्रीविद्या मठ में आज ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामीश्री अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वतीजी महाराज का चौबीसवां सन्यास दिवस अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। इस पावन अवसर पर आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुये पूज्य शंकराचार्यजी ने सन्यास की गहन व्याख्या प्रस्तुत की। इस अवसर पर सन्यास की परिभाषा बताते हुये अपने संबोधन में महाराजश्री ने स्पष्ट किया कि केवल वस्त्र बदल लेना ही सन्यास नहीं है। लोक और परलोक , दोनों ही स्थानों के समस्त भोगों और सुखों के प्रति पूर्ण विरक्ति का भाव जाग्रत होना ही वास्तविक सन्यास है। जब साधक के भीतर संसार की नश्वरता का बोध हो जाता है और वह केवल आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण के लिये समर्पित होता है , तभी उसका सन्यास सार्थक है। महाराजश्री ने आगे कहा कि आज के युग में सन्यास की मर्यादा की रक्षा करना अनिवार्य है। सन्यासी का धर्म केवल अपनी मुक्ति नहीं , बल्कि समाज को सन्मार्ग दिखाना और सनातन मूल्यों की स्थापना करना है। उन्होंने भक्तों को क्षणभंगुर सुखों के त्याग और शाश्वत सत्य की खोज के लिये प्रेरित किया। इस दौरान अखिल भारतीय आध्यात्मिक उत्थान मण्डल की माताओं ने एवं शिष्यों भक्तों द्वारा शंकराचार्यजी की पादुकाओं का विधि-विधान से पूजन-अर्चन किया गया। श्रीविद्या मठ के प्रांगण में वेदपाठी आचार्य अमित पांडेय एवं रघुवीर पंडित द्वारा शांति पाठ और स्वस्तिवाचन किया गया , जिससे संपूर्ण वातावरण आध्यात्मिक ऊँचाई को प्राप्त हुआ। प्रो मंजरी पांडेय ने गौ माता पर स्वरचित गीत की प्रस्तुति दी। यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी ने शिक्षा के केश ग्रंथ के आमुख का विमोचन करवाया। आचार्य शैलेष ने संस्कृत में शंकराचार्यजी पर स्वरचित श्लोकों का पाठ किया। इस अवसर पर काशी के विभिन्न कोनों से आये दण्डी सन्यासी गण उपस्थित रहे , जिन्होंने पूज्य महाराजश्री का आशीर्वाद प्राप्त किया। मठ की और से सभी यतियों को कषाय वस्त्र , रुद्राक्ष कण्ठा , मिष्ठान्न एवं दक्षिणा वितरित की गई। कार्यक्रम के अंत में उपस्थित जनसमूह के बीच प्रसाद वितरण किया गया। मठ परिवार ने पूज्य महाराजश्री के सुदीर्घ और यशस्वी जीवन की कामना करते हुये उनके द्वारा दिखाये जा रहे धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प दोहराया। प्रमुख रूप से आचार्य शत्रुघ्न त्रिपाठी , आचार्य परमेश्वर दत्त शुक्ल , आचार्य सदाशिव द्विवेदी , आचार्य धनंजय पांडेय , आचार्य प्रियव्रत , आचार्य राघवेन्द्र पांडेय ने अपने अपने विचार व्यक्त किये। सभी ने गो रक्षा आंदोलन का समर्थन किया और शंकराचार्यजी के सत्य पर निर्भीकता से अडिग रहने की सराहना की। कृष्ण कुमार तिवारी ने स्वरचित रचना से शंकराचार्यजी को चौबीस कैरेट गोल्ड और चाटुकार सन्तों को क्लीन बोल्ड कहा। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ से स्वामी ज्योतिर्मयानन्द सरस्वती , बाराबंकी से स्वामी असंभव संभवानन्द , साध्वी पूर्णबा , साध्वी शारदाबा , साध्वी राजेश्वरी , रवि त्रिवेदी आदि अनेक भक्तगण उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संयोजन प्रभारी परमात्मानन्द ने और संचालन कृष्ण कुमार ने किया।


















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