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Tuesday, October 13, 2026

मंगली में गरजे पनिका-पनका समाज के योद्धा: 1971 के क्षेत्रीय बंधन के खिलाफ राष्ट्रीय हुंकार, अधिकार की लड़ाई निर्णायक मोड़ पर ले जाने का संकल्प अखिल भारतीय पनिका/पनका समाज संगठन के चौथे राष्ट्रीय महाधिवेशन में सात राज्यों के प्रतिनिधियों का जमावड़ा; राष्ट्रीय संयोजक बिहारी दास मुरचले का ऐलान—‘ना चंदा, ना धंधा, दो साल का वादा; पनिका समाज को उसका अधिकार दिलाने का इरादा’

 मंगली में गरजे पनिका-पनका समाज के योद्धा: 1971 के क्षेत्रीय बंधन के खिलाफ राष्ट्रीय हुंकार, अधिकार की लड़ाई निर्णायक मोड़ पर ले जाने का संकल्प



अखिल भारतीय पनिका/पनका समाज संगठन के चौथे राष्ट्रीय महाधिवेशन में सात राज्यों के प्रतिनिधियों का जमावड़ा; राष्ट्रीय संयोजक बिहारी दास मुरचले का ऐलान—‘ना चंदा, ना धंधा, दो साल का वादा; पनिका समाज को उसका अधिकार दिलाने का इरादा’



मंगली (मंडला), मध्य प्रदेश। पनिका/पनका समाज के सामाजिक अधिकारों, संगठनात्मक एकता और लंबे समय से चले आ रहे क्षेत्रीय बंधन के मुद्दे को लेकर रविवार, 11 अक्टूबर 2026 को ग्राम मंगली, जिला मंडला में अखिल भारतीय पनिका/पनका समाज संगठन का चौथा राष्ट्रीय महाधिवेशन एवं बैठक आयोजित की गई।




 दोपहर 12 बजे से शाम 5 बजे तक चले इस आयोजन में सात राज्यों के प्रदेश प्रभारियों, प्रदेश अध्यक्षों, संगठन पदाधिकारियों, महंतों, दीवानों, सियानों, युवाओं, महिलाओं और समाज के जागरूक लोगों ने भाग लिया।



आयोजकों के अनुसार, कार्यक्रम में लगभग 1,500 से 2,000 लोगों की उपस्थिति रही। महाधिवेशन में समाज की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, वर्ष 1971 से जुड़े क्षेत्रीय प्रतिबंध, अनुसूचित जनजाति (ST) दर्जे की मांग, संगठनात्मक एकता और राजनीतिक प्रतिनिधियों की जवाबदेही जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई।


कबीर साहेब की पूजा-अर्चना से शुरुआत, समाज की एकता का संदेश



महाधिवेशन की शुरुआत कबीर साहेब की पूजा-अर्चना एवं वंदना के साथ हुई। इसके बाद कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों का पुष्पमालाओं से स्वागत किया गया। 




राष्ट्रीय संयोजक एवं अध्यक्ष श्री बिहारी दास मुरचले का समाज के पदाधिकारियों ने विशेष स्वागत किया।



मंच से वक्ताओं ने समाज की एकजुटता, शिक्षा, संगठन विस्तार और अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण एवं लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष करने का आह्वान किया। वक्ताओं का कहना था कि समाज की वास्तविक ताकत केवल संख्या में नहीं, बल्कि जागरूकता, एकता और निरंतर प्रयास में निहित है।


1971 का क्षेत्रीय बंधन बना महाधिवेशन का सबसे बड़ा मुद्दा



महाधिवेशन में वक्ताओं ने वर्ष 1971 में पनिका जाति के अनुसूचित जनजाति संबंधी वर्गीकरण में क्षेत्रीय प्रतिबंधों के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया।




 उनका कहना था कि अलग-अलग क्षेत्रों में पनिका समुदाय की सामाजिक एवं आरक्षण संबंधी स्थिति में अंतर होने के कारण समाज के भीतर असमानता और असंतोष की स्थिति बनी हुई है।



वक्ताओं ने कहा कि वर्ष 2000 में मध्य प्रदेश के विभाजन के बाद छत्तीसगढ़ राज्य का गठन हुआ, लेकिन पनिका समाज की आरक्षण संबंधी स्थिति का प्रश्न आज भी समुदाय के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है।





 समाज के एक वर्ग को अनुसूचित जनजाति तथा दूसरे वर्ग को अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में रखे जाने को लेकर वक्ताओं ने समानता और न्याय की मांग की।



महाधिवेशन में यह मांग दोहराई गई कि पनिका जाति से संबंधित क्षेत्रीय प्रतिबंधों के विषय की संवैधानिक एवं कानूनी स्थिति की समीक्षा कराई जाए तथा केंद्र और संबंधित राज्य सरकारें इस विषय पर स्पष्ट रुख अपनाएं।



वक्ताओं ने कहा कि समाज के लोगों को अपने अधिकारों की मांग करते समय संवैधानिक प्रक्रिया, ऐतिहासिक दस्तावेजों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर आगे बढ़ना होगा।


बिहारी दास मुरचले का जोरदार संबोधन: ‘ना चंदा, ना धंधा, दो साल का वादा’


महाधिवेशन के मुख्य आकर्षण राष्ट्रीय संयोजक एवं अध्यक्ष श्री बिहारी दास मुरचले का संबोधन रहा। उन्होंने समाज के लोगों से आह्वान किया कि वे आपसी मतभेदों को भुलाकर अपने सामाजिक अधिकारों के लिए एकजुट हों।



उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि पनिका समाज की लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि समाज के अधिकार, सम्मान और भविष्य के लिए होनी चाहिए। उन्होंने संगठन की कार्यशैली का उल्लेख करते हुए कहा कि संगठन के पदाधिकारी अपने स्तर पर आर्थिक सहयोग देकर कार्यक्रमों और संगठनात्मक गतिविधियों का संचालन कर रहे हैं।


बिहारी दास मुरचले ने अपने संकल्प को इन शब्दों में व्यक्त किया—



“ना चंदा, ना धंधा, दो साल का वादा; पनिका जाति को उसका अधिकार दिलाने का इरादा।”


उन्होंने कहा कि समाज के अधिकारों की लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति, संगठनात्मक अनुशासन और निरंतर प्रयास आवश्यक हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर वे अपने निजी संसाधनों का उपयोग करके भी समाज के हित में काम करने के लिए तैयार हैं।



उन्होंने विशेष रूप से उन क्षेत्रों में रहने वाले पनिका समाज के लोगों से अपील की, जहां समुदाय के सदस्य अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में आते हैं। उनके अनुसार, समाज के सभी वर्गों के लोगों को एक मंच पर आकर अपने ऐतिहासिक और संवैधानिक अधिकारों से संबंधित मुद्दे को मजबूती से उठाना चाहिए।


समाज के राजनीतिक प्रतिनिधियों से सीधे सवाल: 54 वर्षों के संघर्ष का हिसाब कौन देगा?


बिहारी दास मुरचले ने अपने संबोधन में समाज के राजनीतिक प्रतिनिधियों और पूर्व जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि वर्ष 1971 से जुड़े क्षेत्रीय प्रतिबंधों का मुद्दा लंबे समय से समाज के सामने है, इसलिए यह जानना जरूरी है कि इस विषय को संसद, विधानसभा और सरकारों के समक्ष कितनी बार प्रभावी ढंग से उठाया गया।


उन्होंने सवाल किया कि समाज के प्रतिनिधियों ने इस मुद्दे पर कितने प्रश्न उठाए, कितने ज्ञापन दिए और केंद्र तथा राज्य सरकारों के समक्ष कितनी बार ठोस पहल की।


उन्होंने कहा कि यदि समाज के लोगों को उनका अधिकार दिलाना है, तो केवल मंचों से आश्वासन देने के बजाय ऐतिहासिक रिकॉर्ड, संसदीय कार्यवाही, सरकारी पत्राचार और कानूनी दस्तावेजों को सार्वजनिक चर्चा में लाना चाहिए।


मुरचले ने समाज के लोगों से अपील की कि वे अपने जनप्रतिनिधियों से जवाबदेही की मांग करें और यह जानें कि क्षेत्रीय प्रतिबंधों से जुड़े प्रश्न पर अब तक क्या-क्या प्रयास किए गए हैं।


उनका संदेश स्पष्ट था—समाज को केवल आश्वासनों से नहीं, बल्कि ठोस पहल, प्रमाणित दस्तावेजों और परिणामों से संतुष्ट होना चाहिए।


राजनीतिक परिवारों और सामाजिक नेतृत्व की भूमिका पर उठे सवाल


महाधिवेशन में संबोधन के दौरान कुछ राजनीतिक परिवारों और सामाजिक नेतृत्व की भूमिका पर भी तीखी टिप्पणी की गई। वक्ताओं ने सवाल उठाया कि जिन लोगों को लंबे समय तक राजनीतिक एवं प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाने का अवसर मिला, उन्होंने पनिका समाज के क्षेत्रीय प्रतिबंध संबंधी मुद्दे को हल कराने के लिए क्या ठोस कदम उठाए।


बिहारी दास मुरचले ने कहा कि समाज के नाम पर नेतृत्व का दावा करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपने कार्यों का विवरण समाज के सामने रखना चाहिए। उन्होंने मांग की कि इस विषय पर संसद और विधानसभा में उठाए गए प्रश्नों, केंद्र एवं राज्य सरकारों को भेजे गए पत्रों और अन्य आधिकारिक प्रयासों का विवरण समाज के सामने प्रस्तुत किया जाए।


उन्होंने यह भी कहा कि समाज के हितों को राजनीतिक लाभ, व्यक्तिगत प्रतिष्ठा या संगठनात्मक प्रतिस्पर्धा से ऊपर रखा जाना चाहिए।


महाधिवेशन में व्यक्त इन विचारों के संबंध में संबंधित राजनीतिक व्यक्तियों एवं परिवारों का पक्ष सामने आने पर उसे भी प्रकाशित किया जाना उचित होगा।


‘समाज के नाम पर चंदा लेने वालों से पूछिए—अब तक हासिल क्या हुआ?’


महाधिवेशन में संगठन के कामकाज, आर्थिक पारदर्शिता और सामाजिक आंदोलनों के संचालन पर भी चर्चा हुई। बिहारी दास मुरचले ने आरोप लगाया कि समाज के नाम पर कुछ लोग सदस्यता शुल्क और चंदा एकत्र करते हैं, लेकिन लंबे समय से चल रहे अधिकारों के संघर्ष के परिणामों का स्पष्ट हिसाब समाज के सामने नहीं रखते।


उन्होंने समाज के लोगों से अपील की कि वे किसी भी संगठन को आर्थिक सहयोग देने से पहले उसकी कार्ययोजना, आय-व्यय का विवरण, कानूनी प्रयासों और उपलब्धियों की जानकारी प्राप्त करें।


उन्होंने कहा कि सामाजिक संगठनों की विश्वसनीयता उनके नारों से नहीं, बल्कि उनके काम, पारदर्शिता और समाज के प्रति जवाबदेही से तय होनी चाहिए।


इस दौरान उन्होंने समाज के भीतर मतभेद पैदा करने वाली गतिविधियों से बचने तथा संगठनात्मक विवादों को संवाद के माध्यम से सुलझाने की जरूरत पर भी बल दिया।


न्यायालय, संसद और सरकार की भूमिका पर गंभीर चर्चा


महाधिवेशन में पनिका समाज के आरक्षण संबंधी मामले में पूर्व में हुई कानूनी कार्यवाहियों का भी उल्लेख किया गया। वक्ताओं ने वर्ष 2007 में दायर याचिका और वर्ष 2009 में आए आदेश का संदर्भ देते हुए कहा कि समाज को इन दस्तावेजों की वास्तविक स्थिति, कानूनी प्रभाव और आगे की संभावनाओं को समझना चाहिए।


इस दौरान यह विचार सामने आया कि अनुसूचित जनजाति की सूची में किसी जाति को शामिल करने, उसमें संशोधन करने अथवा संबंधित क्षेत्रीय प्रतिबंधों में बदलाव के लिए संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप सक्षम प्राधिकारियों के समक्ष प्रभावी पहल आवश्यक है।


वक्ताओं ने समाज के शिक्षित युवाओं, कानूनी विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से अपील की कि वे ऐतिहासिक दस्तावेजों का अध्ययन करें, कानूनी स्थिति को स्पष्ट करें और समाज को तथ्यपरक जानकारी उपलब्ध कराएं।


महाधिवेशन में इस बात पर भी जोर दिया गया कि अधिकारों की लड़ाई भावनात्मक नारों के साथ-साथ प्रमाणित तथ्यों, वैधानिक प्रक्रिया और निरंतर लोकतांत्रिक प्रयासों के आधार पर आगे बढ़नी चाहिए।


समाज के ओबीसी और एसटी वर्गों के बीच संवाद पर जोर


महाधिवेशन में एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी दिया गया कि अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में निवासरत पनिका समाज के लोगों के बीच संवाद मजबूत किया जाए।


वक्ताओं ने कहा कि जिन क्षेत्रों में पनिका समुदाय के सदस्य अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में आते हैं और जहां वे अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में सम्मिलित हैं, वहां के सामाजिक अनुभवों, शैक्षणिक अवसरों और सरकारी योजनाओं से संबंधित जानकारी साझा की जानी चाहिए।


समाज के प्रतिनिधियों से आग्रह किया गया कि वे अपने अनुभवों के आधार पर एक तथ्यपरक रिपोर्ट तैयार करें, ताकि आरक्षण संबंधी मुद्दे पर वास्तविक स्थिति सामने आ सके।


वक्ताओं ने शिक्षा, युवाओं के रोजगार, सामाजिक जागरूकता और संगठनात्मक विस्तार को भी समाज के विकास के लिए आवश्यक बताया।


सात राज्यों के प्रतिनिधियों ने एकजुट संघर्ष का लिया संकल्प


महाधिवेशन में विभिन्न राज्यों से आए पदाधिकारियों और सामाजिक प्रतिनिधियों ने अपने विचार रखे। उपस्थित लोगों ने समाज को एकजुट करने, गांव-गांव तक जागरूकता अभियान चलाने और परिवारों से संपर्क कर सामाजिक अधिकारों की जानकारी पहुंचाने का संकल्प लिया।


बैठक में उपस्थित लोगों ने शपथ ली कि वे समाज में जागरूकता बढ़ाने, आपसी मतभेद कम करने और अपने अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक तरीके से संघर्ष करने में सक्रिय भूमिका निभाएंगे।


वक्ताओं ने कहा कि समाज की एकता केवल राष्ट्रीय महाधिवेशन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे प्रत्येक गांव, जिला और प्रदेश में संगठनात्मक गतिविधियों के माध्यम से मजबूत किया जाना चाहिए।


प्रमुख पदाधिकारियों और सामाजिक प्रतिनिधियों की रही सहभागिता


महाधिवेशन में राष्ट्रीय सहसंयोजक सुमित महंत, राष्ट्रीय संरक्षक डॉ. ललित मानिकपुरी, राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी एवं पत्रकार एच.डी. महंत, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष दिलीप बघेल तथा छत्तीसगढ़ से किशन मानिकपुरी सहित विभिन्न प्रदेशों के पदाधिकारी उपस्थित रहे।


इसके अलावा मध्य प्रदेश के प्रदेश प्रभारी आलम दास धरय, प्रदेश अध्यक्ष सुधीर कुमार बघेल, महिला प्रदेश अध्यक्ष इंद्र सोनवानी, सोशल मीडिया प्रभारी सी.डी. सोनवानी, मंडला महिला जिला अध्यक्ष उत्तरा पड़वार, युवा प्रदेश अध्यक्ष रविनंदन (रोहित), अशोक पड़वार, प्रदेश उपाध्यक्ष किशन पड़वार, प्रदेश संरक्षक एवं सेवानिवृत्त शिक्षक पुरन दास सोनवानी, कोर कमेटी सदस्य उगार दास धरवैया, महंत अन्य दास मुरचले, लखन दास टांडिया, महंत अतीत दास संत, संरक्षक यशवंत बघेल, सियान मंगल दास टांडिया तथा कबीर आश्रम समिति बैहर के अध्यक्ष करन दास परवार सहित अनेक सामाजिक प्रतिनिधियों ने सहभागिता की।


छत्तीसगढ़ के प्रभारी एवं अध्यक्ष प्रदीप महंत, महाराष्ट्र के प्रदेश प्रभारी कुंदन सोनवानी, प्रदेश अध्यक्ष यशवंत बैरागी तथा उत्तर प्रदेश के प्रदेश प्रभारी मुनेश्वर पनिका सहित अन्य प्रदेशों के पदाधिकारियों की उपस्थिति का भी उल्लेख किया गया।


महाधिवेशन में समाज के महंतों, दीवानों, सियानों, सरपंचों, बुद्धिजीवियों, महिलाओं और युवा साथियों ने सक्रिय भागीदारी निभाई।


कार्यक्रम का सफल संचालन विनीत भाषंत, रविंद्र भाषंत और बालाघाट जिला अध्यक्ष दीवान दामोदर टांडिया ने किया।


किशन मानिकपुरी ने संगठनात्मक एकता और मीडिया की भूमिका पर दिया जोर


महाधिवेशन में छत्तीसगढ़ से पहुंचे किशन मानिकपुरी ने संगठनात्मक एकता, जनजागरण और सामाजिक अधिकारों से संबंधित मुद्दों को प्रभावी ढंग से जन-जन तक पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया।


उन्होंने कहा कि समाज के अधिकारों से जुड़े विषयों को केवल बैठकों और सम्मेलनों तक सीमित रखने के बजाय गांवों, जिलों, प्रदेशों और राष्ट्रीय स्तर पर निरंतर उठाया जाना चाहिए।


उन्होंने सामाजिक पदाधिकारियों, युवाओं और मीडिया से अपील की कि वे प्रमाणित तथ्यों के आधार पर समाज के मुद्दों को सामने लाएं तथा संगठन की गतिविधियों और अधिकारों से जुड़े प्रयासों की जानकारी व्यापक स्तर पर पहुंचाएं।


उन्होंने यह भी कहा कि समाज की एकजुटता, शिक्षा और जागरूकता ही किसी भी बड़े सामाजिक परिवर्तन की मजबूत नींव होती है।


अब गांव-गांव तक पहुंचेगा जागरूकता अभियान


महाधिवेशन के समापन पर उपस्थित लोगों ने समाज को जागरूक करने और संगठन को मजबूत बनाने का संकल्प लिया। वक्ताओं ने कहा कि लंबे समय से लंबित मुद्दों पर परिणाम प्राप्त करने के लिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति की सहभागिता जरूरी है।


बैठक में यह संदेश प्रमुखता से उभरा कि सामाजिक अधिकारों की लड़ाई किसी एक व्यक्ति, परिवार या संगठन की नहीं, बल्कि पूरे समुदाय के भविष्य से जुड़ा विषय है।


समाज के प्रतिनिधियों ने संकल्प लिया कि वे आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर संवैधानिक अधिकारों, सामाजिक सम्मान, शिक्षा और संगठनात्मक एकता के लिए मिलकर प्रयास करेंगे।


महाधिवेशन का मूल संदेश


“एक देश, एक समाज, एकता का संकल्प—पनिका समाज के अधिकारों के लिए संगठित और संवैधानिक संघर्ष।”


मंगली में आयोजित चौथे राष्ट्रीय महाधिवेशन ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि समाज के ऐतिहासिक प्रश्नों का समाधान केवल आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि एकता, पारदर्शिता, प्रमाणित दस्तावेजों, कानूनी पहल और सरकारों की जवाबदेही सुनिश्चित करने से ही संभव है।


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समाचार प्रेषक:

सुधीर कुमार बघेल 

प्रदेश अध्यक्ष मप्र 

अखिल भारतीय पनिका/पनका समाज संगठन

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