शारदीय नवरात्रि का चौथा दिन नवदुर्गा के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा की आराधना को समर्पित होता है।
सी एन आइ न्यूज पुरुषोत्तम जोशी। शारदीय नवरात्रि 2026- हिंदू धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, मां कूष्मांडा को ब्रह्मांड की आदिशक्ति और रचयिता माना जाता है। मान्यता है कि जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था और चारों ओर केवल घना अंधकार था, तब देवी ने अपनी मंद मुस्कान (हास्य) से ब्रह्मांड रूपी अंड की रचना की थी, इसलिए इन्हें 'कूष्मांडा' कहा गया।
अष्टभुजा देवी: मां कूष्मांडा की आठ भुजाएं हैं, जिसके कारण इन्हें अष्टभुजा भी कहा जाता है।
अस्त्र-शस्त्र और वस्तुएं: इनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र, गदा और सभी सिद्धियों व निधियों को देने वाली जपमाला सुशोभित है।
वाहन और निवास: देवी सिंह पर सवारी करती हैं, जो साहस और पराक्रम का प्रतीक है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में है, क्योंकि केवल इनमें ही सूर्य के समान तेज को सहने की शक्ति है।
नाम का अर्थ
'कूष्मांडा' शब्द तीन शब्दों से मिलकर बना माना जाता है:
कु (Ku): छोटा
उष्मा (Ushma): ऊर्जा या गर्मी
इसके अलावा, संस्कृत में कुम्हरे (कद्दू) को 'कूष्माण्ड' कहते हैं। चूंकि देवी को कुम्हरे की बलि सबसे प्रिय है, इसलिए भी इन्हें कूष्मांडा कहा जाता है।
पूजा का महत्व और अनुष्ठान
आध्यात्मिक चक्र: योग साधना की दृष्टि से नवरात्रि के चौथे दिन साधक का मन 'अनाहत चक्र' में स्थित होता है।
कृपा और आशीर्वाद: इनकी पूजा से भक्तों के रोग, शोक और कष्टों का नाश होता है तथा आयु, यश, बल व आरोग्य की वृद्धि होती ।


















No comments:
Post a Comment
Please do not enter any spam link in the comment box.