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Saturday, September 12, 2020

महादेवी वर्मा पुण्यतिथि आज -- अरविन्द तिवारी की कलम✍️ से


रायपुर -- छायावादी कवयित्री, गद्य लेखिका और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी महादेवी वर्मा की आज 23वीं पुण्यतिथि है। महादेवी वर्मा ने संवेदनशील लेखन के जरिये महिलाओं के साथ होने वाले भेदभावपूर्ण रवैये पर गहरी चोट की थी। यही वजह थी कि उनको ‘मॉडर्न मीरा’ के नाम से जाना जाता है। महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च 1907 को उत्तरप्रदेश के फर्रुखाबाद में हुआ था। वे पढ़ाई में काफी निपुण थीं। उन्होंने 1921 में आठवीं कक्षा में प्रांत में प्रथम स्थान हासिल किया था। ये सात साल की उम्र से ही कविता लिखनी शुरू कर दी थी। उन्होंने 1932 में प्रयाग विश्वविद्यालय से संस्कृत में एमए किया। यह वह समय था, जब ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ देश में आजादी का बिगुल बजा रहा था। दूसरी ओर महादेवी को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के लिये स्कॉलरशिप मिली थी। वह विदेश जाने को लेकर असमंजस में थीं। ये महात्मा गांधी से मार्गदर्शन लेने अहमदाबाद गईं। गांधीजी से पूछा, ‘बापू मैं विदेश जाऊं या नहीं?’ गांधीजी कुछ देर चुप रहने के बाद बोले, ‘अंग्रेजों से हमारी लड़ाई चल रही है और तू विदेश जायेगी? अपनी मातृभाषा के लिये काम करो और बहनों को शिक्षा दो।’ यहीं से महादेवी के जीवन की राह बदल गई। महादेवी वर्मा ने महिलाओं की शिक्षा और उनकी आर्थिक निर्भरता के लिये बहुत काम किया। महादेवी वर्मा का सबसे क्रांतिकारी कदम था महिला-शिक्षा को बढ़ावा देना। उन्होंने इलाहाबाद में प्रयाग महिला विद्यापीठ के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने 1955 में इलाहाबाद में साहित्यकार संसद की स्थापना की। उन्होंने ही भारत में महिला कवि सम्मेलनों की नींव रखी। इसके बाद 15 अप्रैल 1933 को सुभद्रा कुमारी चौहान की अध्यक्षता में प्रयाग महिला विद्यापीठ में पहला अखिल भारतीय कवि सम्मेलन हुआ। महादेवी के पिता गोविंद प्रसाद वर्मा शिक्षक थे। मां हेमरानी देवी एक गृहणी थीं। उनके परिवार में सात पीढ़ी के बाद किसी लड़की का जन्म हुआ था। इसी के चलते ही मां-बाप ने उन्हें देवी कहा और महादेवी नाम रखा। उनकी महज 09 साल उम्र (1916) में डॉ. स्वरूप नारायण वर्मा से शादी हो गई थी। इनका शादीशुदा जीवन अच्छा नहीं रहा। साहित्यकार गंगा प्रसाद पांडेय ने उन्हें महीयसी और सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने सरस्वती की उपाधि दी थी। उन्हें 1956 में पद्मभूषण, 1982 में ज्ञानपीठ, 1988 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। इन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय प्रयागराज में बिताया। उनका 11 सितंबर 1987 को इलाहाबाद में देहांत हुआ था। आज उनकी पुण्यतिथि पर विभिन्न सामाजिक एवं साहित्यिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने उनके प्रतिमा स्थल पर पहुँचकर श्रद्धासुमन अर्पित किये। इसके अलावा साहित्यकारों और साहित्य अनुरागियों ने उनकी स्मृतियों को याद करते हुये कहा कि महादेवी वर्मा की रचनायें युवाओं को प्रेरणा देने का काम करती है।

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