अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
जगन्नाथपुरी -- ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरू शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती जी महाभाग अपने नवीनतम संदेश में संयुक्त राष्ट्र संघ से भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की मांग की है। इसी तरह पुरी शंकराचार्य जी बुद्धिमत्ता की परख शीर्षक से संदेश देते हैं कि देहावसान के बाद देहात्मवादी भी सनातन संविधान की सीमा में ही कर्मफल भोगने के लिये बाध्य है। ऐसी स्थिति में ईश्वरीय संविधान के अनुपालक यमराज्य के न्यायालय में जिस संविधान को मान्यता प्राप्त है,उसी के अनुसार व्यक्ति तथा समाज की संरचना बुद्धिमत्ता है। अब प्रश्न यह उठता है कि किस प्रकार के व्यक्तियों के द्वारा शासित राष्ट्र सनातनी हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा को चरितार्थ कर सकता है । तब पुनः पुरी शंकराचार्य जी शासकवर्ग के व्यक्ति के लिये आवश्यक गुण के संबंध में प्रशस्त राष्ट्रवाद शीर्षक से सूत्रात्मक रूप से संदेश देते हैं कि सत्तालोलुपता और अदूरदर्शिता से सुदूर विश्वकल्याण की भावना से भावित, सूझ - बुझ सम्पन्न राष्ट्रभक्तों के हाथ में देश का शासन सौंपना आवश्यक है । मार्गच्युत राजनेताओं ने राजगद्दी तथा व्यासगद्दी दोनों को दिशाहीन बना दिया है । सबकी जीविका जन्म से सुरक्षित रखने वाली तथा शिक्षा, न्याय, रक्षा, वित्त, सेवा, और स्वच्छतादि को समाज में सबके लिये संतुलित और सुलभ रखने वाली सनातन वर्णव्यवस्था के शास्त्रीय स्वरूप का अज्ञता और विद्वेषवश विलोप सभी समस्याओं का मूल है । ऐसी स्थिति में आध्यात्मिक ओज से संपन्न अद्भुत प्रज्ञावान मानस्वियों को विश्वस्तर पर देश, काल, परिस्थिति को परखकर तथा सत्यसाहिष्णुता की क्रमिक अभिव्यक्ति के महत्व को समझकर अमोघ व्यूहरचना अवश्य प्रस्तुत करनी चाहिये। महाराजश्री ने जोर देते हुये कहा कि प्रशस्त राष्ट्र की संरचना के लिये प्रत्येक व्यक्ति को स्वावलम्बी, सुबुद्ध और सत्यसहिष्णु बनाने की विधा अपनाने की आवश्यकता है ।


















No comments:
Post a Comment
Please do not enter any spam link in the comment box.