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Saturday, January 16, 2021

समष्टि हित की भावना सर्वोपरि --- पुरी शंकराचार्य



अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट 


जगन्नाथपुरी - ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्द्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरू शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती जी महाराज सनातनी हिन्दुओं में समष्टि हित एवं समष्टि पोषण की भावना जागृत होने की अनिवार्यता पर स्पष्ट करते हैं कि व्यासपीठ और राजपीठ का अपेक्षित शोधन तथा दोनों में सैद्धान्तिक सामञ्जस्य सनातन मनीषियों का सुनिश्चित कर्त्तव्य है। कालक्रम से विलुप्त ज्ञान -- विज्ञान को तपोबल से समाधिभाषा में समुपलब्ध करना तथा कालक्रम से विकृत ज्ञान-विज्ञान को विशुद्ध करना सनातन मनीषियों का सुनिश्चित दायित्व है। किसी पर ना अनर्गल छाना , किसी को ना अनर्गल छाने देना , ना किसी से अनर्गल भिड़ना , ना किसी से अनर्गल दबना यह मेरा व्रत है। जब जीवन सर्वेश्वर के प्रति समर्पित है और सर्वेश्वर सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् एवम् सर्वरूप हैं, तब कौन मित्र और कौन शत्रु, कौन अपना तथा कौन पराया ? प्रारब्धपतित शरीर से कहीं मान , कहीं अपमान , कहीं सुख , कहीं दु:ख को सहते हुये राहुग्रस्त दिवाकर के तुल्य गन्तव्य की ओर बढ़ते चलना अध्यात्म पथिक का कर्त्तव्य है। मेरे आदर्श श्री प्रह्लाद हैं और मेरे अधिपति श्री परशुराम, श्रीस्कन्द तथा श्रीशेष ; मेरे इष्ट श्रीकृष्ण और उद्धोधक श्रीराम हैं। सूर्य , गणेश , शक्ति तथा शिव मेरे पालक तथा रक्षक हैं , मेरे जीवन में इनका बाह्याभ्यन्तर सन्निवेश है। जीव निर्दोष और सम सच्चिदानन्दस्वरूप सर्वेश्वर का सनातन अंश-सरीखा है। सदोष और विषम शरीर तथा संसार में अहंता तथा ममता के कारण वह भगवान से विमुख होकर वेदनाग्रस्त होता है। स्थावर तथा जङ्गम सर्वप्राणियों के हित की भावना से अपने-अपने अधिकार के अनुरूप सन्ध्या , तर्पण , अग्निहोत्र , बलिवैश्वदेव , यज्ञ , दान , तप , अतिथिसेवा तथा सर्वेश्वर की आराधनादि जीवन और जगत् को पावन करने में समर्थ है। परतन्त्र भारत में अधिकांश आर्य- वैदिक-सनातनी-हिन्दुओं में समष्टि हित की भावना विलुप्तप्राय हो जाने पर भी समष्टिपोषक सन्ध्या, तर्पण , अग्निहोत्रादिकी प्रथा का प्रायः विलोप ना होने के कारण गोवंश, पीपल आदि से प्राप्त निसर्गसिद्ध समष्टिपोषण के सदृश अनिच्छन्नपि समष्टि हित हो जाता था। स्वतन्त्र भारत में  समष्टि हित की भावना एवम् सन्ध्या, तर्पण, अग्निहोत्रादिकी की प्रथा का प्रायः विलोप होने के कारण समष्टि पोषण प्रायः विलुप्त है। नीति तथा अध्यात्मविहीन शिक्षा तथा जीविका पद्धति के कारण धन , मान , प्राण , परिजन तक सीमित संकीर्ण मनोवृत्ति के वशीभूत हिन्दु अपने अस्तित्व और आदर्श की रक्षा करने में सर्वथा पंगु सिद्ध हो रहा है। जब किसी को करोड़ों रूपये से खेलने के व्याहमोह में दूसरे की भूख- प्यास , सर्दी-गर्मी आदिजन्य वेदना नहीं व्यापती तथा शनैः-शनैः धनसञ्चय के व्याहमोह में स्वयं की भूख- प्यास आदिजन्य वेदना भी नहीं व्यापती , तब वह अन्तर्यामित्व का दमन कर करोड़ों रूपयों का सञ्चय कर पाता है। उस परिस्थिति में वह पशुवत् , वृक्षवत् और पाषाणवत् हो जाता । अतएव अपने अन्तर्यामित्व को विकसित करने के लिये अन्यों की वेदना का व्यापना तथा उसके शमन करने के लिये यथा सम्भव प्रयत्नशील रहना और समर्थ प्रभु से प्रार्थना करना परमावश्यक है।

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