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Tuesday, January 19, 2021

विश्व के संचालन की विधा वेदों में सन्निहित --- पुरी शंकराचार्य


अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट 


जगन्नाथपुरी - ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्द्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरू शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती जी महाराज जी उद्घृत करते हैं कि गुरु , ग्रन्थ और गोविन्द की कृपा से पूरे विश्व के संचालन एवं मार्गदर्शन की क्षमता है। पुरी शंकराचार्य जी संकेत करते हैं कि ब्राह्मण का जीवन सम्मान पाने योग्य हो, कदाचित कोई व्यक्ति अपनी नादानी से , मुर्खता से , अज्ञानता से किसी सम्मान पाने योग्य ब्राह्मण का अपमान कर दे तो ब्राह्मण समझे अपमान नहीं अमृत है और कोई उसके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर सम्मान करे तो समझे विष है , यह है ब्राह्मण का धर्म ,जबसे ब्राह्मण ने समझा सबसे दान लेना सम्मान लेना धर्म है , ब्राह्मण का पतन हो गया। दंडी स्वामी का पतन क्यों हुआ ? दण्ड ग्रहण मात्र से नर नारायण बन जाता है फिर उन्होंने अपने को नारायण समझ लिया , यह हमारे समझने के लिये है या सामने वाले को समझाने की लिये , हम नारायण समझे या हम नारायण हो गये पाँव फैलाकर हमारी पूजा करो हमें भेंट दो। जहांँ जीविका के साथ धर्म का अर्थ होता है भोगकर्म , ब्राह्मण के क्षेत्र कम है , यज्ञ करना , दान देना , वेदाध्ययन करना यह धर्म का मुख्य कर्म है , यज्ञ करना धर्म भी है जीविका से सम्बद्ध भी है , दान लेना मुख्य धर्म नहीं है दान देना मुख्य धर्म है और जीविका से सम्बद्ध है , अध्यापन करना जीविका से सम्बद्ध है , जीविका प्रधान धर्म , धर्म तो है , जीविका प्रधान धर्म और धर्मो प्रधान धर्म , दो धर्म के भेद होते होते है ,जब उसका एक अंश चला जाता है तो उसमे विलुप्ति आ जाती है ! तो ज्यादा कही किसी तन्त्र से भिड़ने की आवश्यकता नहीं है , हमारे किस प्रमाद के कारण कौन सा तन्त्र पैदा हुआ उसको समझ कर ठीक करने की आवश्यकता है ! आर्कमिडीज ने कहा था कि यदि पृथ्वी का केंद्र अगर हमको पता चल जाये तो मै उसे उठा दूँ , अभिमान की बात नहीं है , आर्कमिडीज जी को पृथ्वी का केंद्र पता चला या नहीं लेकिन हम लोगो को गुरुओ की कृपा से विश्व का केंद्र पता है , जहांँ से विश्व का सञ्चालन होता है , आवश्यकता है तो यह की दो – चार व्यक्ति भी जीवन में जहाँ से विश्व का सञ्चालन होता है , वह तन्त्र क्या है , वह ज्ञान क्या है , सिखने का प्रयास करें। प्रायः होता क्या है जिनमें सीखने की इच्छा है तो उनमें उतनी मेधाशक्ति नहीं है , जिन्हें सिखना चाहिए वे सिखाने आ जाते है।  मुसीबत यह है कि बोले तो कौन , नहीं तो कहाँ से विश्व का सञ्चालन हो रहा है यह ज्ञान विज्ञान गुरुओ की कृपा से है हमारे पास। तन्त्र में एक जगह आता है कि शिव जी एक बार गेंद खेलने लगे, शिवजी गेंद को उछाल रहे थे एक एक ब्रह्माण्ड को गेंद बनाकर उछाल रहे थे शिवजी , साढ़े तीन करोड़ ब्रह्माण्ड है , आजकल के वैज्ञानिको को पता नहीं है। स्कन्द पुराण में श्री ब्रह्माजी ने श्री जगन्नाथ जी की स्तुति की वहा साढ़े तीन करोड़ ब्रह्माण्ड है अनंत कोटि ब्रह्माण्ड माने प्रकार , संख्या की द्रष्टि से साढ़े तीन करोड़ ब्रह्माण्ड है , सात करोड़ मन्त्र है , प्रणव के उलट फेर से सात की संख्या बनती है सात करोड़ , साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं वे सब प्रणव के आधार पर मतलब साढ़े तीन करोड़ ब्रह्माण्ड है , साढ़े तीन करोड़ ब्रह्मा है लेकिन पूरे ब्रह्माण्ड के केंद्र को समझ लिया जाये तो पूरे ब्रह्माण्ड का सञ्चालन सुगमता पूर्वक हो सकता है, तो एक प्रान्त व एक देश की क्या बात है। समझने वाले कम है या तो समझे या तो माने , जो मानते हैं वो जानते नहीं और जो जानते हैं वो मानते नहीं मूल समस्या यही है ।

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