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Monday, March 15, 2021

एक आस संस्था ने दीप्ति वर्मा को दिलायी नई पहचान



अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट 


अम्बिकापुर - जंगलों एवं पगडंडियों पर बेकार पड़े पत्थरों पर जान डालने की दृढ़संकल्पित जज्बा ने श्रीमति दीप्ति वर्मा को  प्रदेश स्तर पर एक नई पहचान दिला दी। अम्बिकापुर नगर निगम क्षेत्र में निवास करने वाली दीप्ति के पिताजी बृजमोहन लाल वर्मा सिंचाई विभाग से सेवानिवृत्त हैं और मां श्रीमति राजेश्वरी वर्मा कुशल गृहिणी हैं। एक बड़े भाई सहित तीन बहनों में पेशे से व्याख्याता मंझली बहन दीप्ति वर्मा ने चर्चा के दौरान अरविन्द तिवारी को बताया कि उनके अंदर बचपन से ही चित्रकारी का शौक था। वे जब भी  टीवी पर किसी कला प्रदर्शनी की खबर देखती तो सोचती कि एक दिन उनकी चित्रकारी का प्रदर्शन होगा। उन्होंने आगे बताया कि प्रकृति से लगाव और जानवरों में रुचि होने के कारण वर्ष 2014 में एमएससी फॉरेस्ट्री & वाइल्डलाइफ (मास्टर वन्य एवम वन्यजीव) करके वर्ष 2015 में छत्तीसगढ़ वन विभाग प्रशिक्षण स्कूल में व्याख्याता के पद पर सेवा शुरू की , जिसकी वजह से अक्सर ही उनका जंगलों में आना जाना लगा रहता था। वे कहती है कि एक दिन जंगलों मै पड़े बेकार पत्थरो पर नजर गई और इन पर चित्रकारी करने का खयाल आया। उन दिनों क्षेत्र में विभाग का हाथी मानव द्वंद की समस्या एक अहम मसला था। आये दिन हाथियों द्वारा ग्रामीणों के जान माल की क्षति और ग्रामीणों द्वारा हाथियो को नुकसान पहुंचानें और कभी कभी उनकी हत्या करने जैसी घटनायें भी घटित होती रहती थीं। इस समस्या को नियंत्रित करने के लिये  अपने उच्च अधिकारियों व कर्मचारियों के साथ वे भी निरंतर प्रयासरत रही। उसी समय उन्होंने "हाथी बचाओ" की एक थीम लेकर अपने कला को पत्थरों पर उकेरने की शुरुवात की, प्रकृति और जंगली जीवों से लगाव होने के कारण आमजनों तक इनके प्रति जागरूकता लाने के लिये अपनी कला को एक माध्यम बनाया। चित्रकारी के लिये वे ऐसे पत्थरों को चुनती जो किसी को लेने देने और रखने में सुविधा जनक हो। उनको मीडियम पत्थर में कलाकृति करने में लगभग तीन घंटा का समय लगता है। उस समय के सरगुजा सर्किल प्रभारी मुख्य वनसंरक्षक के०के० बिसेन ने उनके हाथी बचाओ थीम पर बने एक पत्थर को देखकर कलाकृति की बहुत सराहना की। उन्होंने इस कलाकृति को आगे बढ़ाने और प्रकृति व ग्रामीणों से जोड़ने की बात कही। इस प्रोत्साहन के बाद दीप्ति वर्मा पत्थरों पर प्रकृति और वन्य प्राणीयों से सम्बंधित कलाकृतियां बनाकर विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों को पेपर वेट के रूप में अपने स्टोन आर्ट भेंट करने लगी। इसके अलावा वे हर छोटे बड़े कार्यक्रमों में आने वाले अतिथियों को स्मृति चिन्ह के रूप में अपनी कला को भेंट करने लगी। उनके द्वारा पत्थरों में हाथी और उनके समूह , शेर , तेन्दूवा इत्यादि वन्य जीवों का चित्र उकेरा गया है। उन्होंने आगे बताया कि एक बार वनमहोत्सव के कार्यक्रम में छग स्वास्थ्य मंत्री टी० एस० सिहदे का आगमन हुआ तब उन्हे भी स्मृति चिन्ह के रूप में (स्टोन आर्ट) भेंट करने का अवसर मिला , मंत्री महोदय ने कलाकृति को देखते ही तारीफ करते हुये बहुत प्रोत्साहित भी किया।इसके बाद उन्होंने मैनपाट महोत्सव सहित कई महोत्सवों में अपनी कलाकृतियों की प्रदर्शनियां लगायी जहां लोगों ने उनके काम को बहुत सराहा और उन्हे खरीदा भी। इस तरह धीरे धीरे लोग उन्हें स्टोन आर्टिस्ट के रूप में जानने लगे। अपनी कला के बारे में बताते हुये वे कहती हैं कि जब बेकार पड़े पत्थरों ने पहचान दिलाई तब से पत्थर मेरे लिये अनमोल बन गये। सब कुछ अच्छा ही चल रहा था। इस बीच वैश्विक कोरोना महामारी के मद्देनजर लॉकडॉउन की वजह से वन प्रशिक्षण स्कूल भी बंद हो गये और ब्याख्याता का पद अस्थायी होने के कारण उनका काम भी बंद हो गया। उनको लगा कि मानो उनका सब कुछ खत्म हो गया। लॉकडउन की शुरुवात में ही उनकी शादी हुई और जिंदगी कि नई शुरुवात के साथ उनके पति ने भी इस कलाकृति को प्रोत्साहित किया। इसके बाद उन्हें अपनी कला को नये सिरे से निखारने का अवसर मिला। फिर उन्होंने पत्थरों के साथ साथ लकड़ी के टुकड़ों पर भी चित्रकारी शुरू करते हुये शंकरजी , राधाकृष्ण की भी चित्र बनाना शुरू की। फिर उन्होंने अपनी कलाओं की श्रेणियां बनानी शुरु की। हालांकि उनकी शुरुवात तो अच्छी नहीं थी पर धीरे धीरे लोगों के मांग आते गये , काम बढ़ता चला गया और अब सब कुछ पहले से भी ज्यादा बेहतर हो गया। लकड़ी पर कलाकृति करने में उनको लगभग दो दिन का समय लग जाता है। लॉकडॉउन के मद्देनजर उनकी मुलाकात "एक आस" जनकल्याण संस्था की सदस्य संतोषी नागे से हुई। जिन्होंने उनके कलाकृति की प्रशंसा करते हुये बताया कि ये संस्था विगत पांच वर्षों से सरगुजा सम्भागीय क्षेत्र में महिलाओं के उत्थान और उनके हित के लिये कार्य कर रही है , महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना , उन्हे स्वरोजगार दिलाना संस्था का मुख्य उद्देश्य है। कुछ दिनों बाद पता चला कि बिश्रामपुर में होने वाले हस्तशिल्प प्रदर्शनी के आयोजन होना है जिसमें स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं द्वारा बनाये गये सामानो को बाजार उपलब्ध कराया जा रहा है और इस प्रदर्शनी मै उन्हें भी शामिल होने के लिये कहा गया है। "एक आस" संस्था के संस्थापक कृष्णचंद तिवारी ने उनकी कला को देश के कोने-कोने तक ले जाने के लिये मार्गप्रशस्त करने की बात कही। अंत में अपने लक्ष्य के बारे में बताते हुये दीप्ति वर्मा कहती हैं कि पत्थरों व लकड़ियों पर करने वाली कलाकृति को वे ग्रामीण अंचल के लोगों को सिखाना चाहती हैं ताकि उन्हे आमदनी का एक नया जरिया मिल सके और जंगलों पर उनकी निर्भरता भी कम हो सके। इसके अलावा वे जंगल और जानवरों के प्रति जागरूक हों। वे लोगों को कला के जरिये प्रकृति के लिये अपने योगदान को समझाना चाहती हैं। वे चाहती हैं कि लोग केवल बातों तक ही सीमित ना रहें बल्कि नदी , पहाड़ , जंगल , पर्यावरण संरक्षण पर भी धरातल पर काम करें। एक आस संस्था द्वारा मिल रहे प्रोत्साहन और सहयोग के प्रति आभार व्यक्त करते हुये वे कहती हैं कि अब तक राज्य स्तर के वन विभाग अधिकारियों  को अपनी कलाकृति सौंपने के बाद उनकी इच्छा प्रधानमंत्री को स्मृति स्वरूप अपनी कला को भेंट करने की है। वे सबके सहयोग , अपनी मेहनत व लगन से अपने सपने को पूरा करने का भरसक प्रयास कर रही हैं।

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