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Monday, March 15, 2021

सनातन धर्म के परिपालन में पुरूषार्थ चतुष्टय की संसिद्धि सुनिश्चित --- पुरी शंकराचार्य

 


अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट 


जगन्नाथपुरी - ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्द्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरू शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती जी महाराज पुरूषार्थ सिद्धि की अमोघ विधि के संबंध में चर्चा करते हुये संकेत करते हैं कि व्यवहार और परमार्थ -- सिद्धि की प्रशस्त विधा सनातन धर्म है। सनातन धर्म में सबको सुबुद्ध, स्वावलम्बी और सत्यसहिष्णु बनाने का मार्ग प्रशस्त है। इसके परिपालन से धर्मातिरिक्त अर्थ , काम और मोक्षरूप शेष तीन पुरूषार्थों की संसिद्धि भी सुनिश्चित है। अतएव धर्म के महत्व को समझते हुये देहेन्द्रिय प्राणान्त:करण को संयत रखते हुये , जीवन में धर्म की प्रधानता देते हुये पहले धर्माचरण करके ही अर्थोपार्जन का प्रयास करे। ध्यान रहे ; धर्मपरायण पुरूष पर सब प्राणियों का विश्वास होता है तथा विश्वासपात्र के सब प्रयोजन स्वत: सिद्ध होते है। सर्वप्रथम  धर्माचरण करें तत्पश्चात धर्मयुक्त अर्थ का उपार्जन फिर धर्म और अर्थ के अविरूद्ध और अनुकूल काम का सेवन करें। तदन्तर वह स्वत:सिद्ध ब्रह्मसिद्धि के लिये तत्पर रहकर जीवन को सार्थक करे। जो वेदोक्त संस्कारों से सम्पन्न है तथा नियमपूर्वक रहकर मन और इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर चुका है, उस विज्ञ पुरूष को इहलोक और परलोक में कहीं भी सिद्धि प्राप्त होते देर नहीं लगती। जो विवेक विज्ञानजन्य सुख को प्राप्त है , द्वन्द्वों से अतीत तथा मत्सरता से विमुक्त हैं , उन्हें अभीष्ट की सिद्धि रूप अर्थ और असिद्धिरूप अनर्थ कभी व्यथित नहीं करते। धर्म का वास्तव फल मोक्ष है। धर्मानुष्ठान से सुलभ अर्थ के द्वारा धर्मानुष्ठान और तत्वचिन्तन के अनुरूप  जीवन की समुपलब्धि विहित है। अर्थ का विनियोग विषयलम्पटता की परिपुष्टि में निषिद्ध है। विषयोपभोग रूप काम की सार्थकता जीवनलाभ में सन्निहित है , ना कि इन्द्रियप्रीति में। जीवनलाभ में विनियुक्त काम से अवशिष्ट काम के द्वारा इन्द्रियप्रीति रूपा प्रसन्नता अर्थात् निर्मलता सुनिश्चित है। इन्द्रियप्रीति रूपा निर्मलता की सार्थकता इन्द्रियसमुदाय रूप करणग्राम से स्वयं को विविक्त और इनका प्रयोक्ता जीवरूप समझने में है। ऐसे जीव की सार्थकता भी जीवनधन अद्वय विज्ञानघन ब्रह्मसंज्ञक  परमात्मस्वरूप भगवत्तत्व की जिज्ञासा में सन्निहित है , ना कि कर्मानुष्ठान के के द्वारा लौकिक अर्थ, कामादि की समुपलब्धि में अर्थात् उत्क्रमण और पुनर्भवरूप संसृतिचक्रकी अनुवृत्ति में सन्निहित है। अर्थ , धर्म और काम को वास्तव पुरूषार्थ का रूप प्रदान करने के लिये तीनों के मल का शोधन आवश्यक है। फलेच्छा धर्म का मल है , संग्रह अर्थ का मल है , आमोद और प्रमोद काम का मल है। धर्मानुष्ठान में लोभ , अर्थोपार्जन में अनभिज्ञता और काम में  शक्तिहीनता विघ्नकारक है । धर्म से शान्ति , अर्थ से सर्वहितप्रद कर्म तथा विषयोपभोग रूप काम से श्रेयस्कर जीवन की समुपलब्धि होने पर इनकी सार्थकता है। जो धर्म और अर्थ का परित्याग करके केवल काम का ही सेवन करता है , वह धर्म और अर्थ के परित्याग के फलस्वरूप इस जीवनकाल में बुद्धिनाश को प्राप्त होता है ।

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