अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
जगन्नाथपुरी - हिन्दू धर्म के सार्वभौम धर्मगुरु पुरी शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती जी महाराज आर्यसंस्कृति के उद्गम वेद और वैदिक वांगमय में सन्निहित विज्ञान की चर्चा करते हुये संकेत करते हैं कि अनादि सर्वेश्वर के सर्ग, स्थिति , प्रलयादि विषयक अनादि बोध में अनुगत अभङ्ग आनुपूर्वीघटित शब्दराशि का नाम वेद है। आर्य संस्कृति के उद्गमस्थल और प्रेरणा स्त्रोत वेद और वैदिक वांगमय पर हमें गर्व है। इन्हीं के बल पर हमारे पूर्वजों ने विश्व में धर्मराज्य और रामराज्य की स्थापना की है। पृथिव्यादि कालगर्भित का ही नहीं ; अपितु अव्यक्तादि कालातीत का बोध भी वेद तथा वेदबीज ओंकार के द्वारा सम्भव है। वैदिक वांगमय का तात्पर्य सच्चिदानन्द रूप सर्वेश्वर में सन्निहित है ; जो कि सर्वाधिष्ठान है ; अतएव सर्वरूप है । यही कारण है कि सर्व देश , सर्व काल और सर्व वस्तुओं का विज्ञान वैदिक वांगमय के अनुशीलन से सम्भव है। वैदिक वांगमय की उत्कृष्टता के कारण वैदिक वांगमय की भाषा संस्कृत की उत्कृष्टता भी सिद्ध है। सूत्रशैली , वृत्ति शैली , भाष्यशैली , व्यासशैली , छन्दोबद्ध शैली में भावाभिव्यक्ति में समर्थता तथा अनेकार्थक और पर्यायवाचक शब्दों की सम्पन्नता एवम् समृद्ध व्याकरण की विद्यमानता के कारण भी संस्कृत का उत्कर्ष है। विश्व की आदि भाषा होने से भी संस्कृत सर्व भाषाओं की जननी है। वेदविहित कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड और ज्ञानकाण्ड को ना मानने पर वेदविहीन विज्ञान के द्वारा प्रस्थापित विश्व नरक तथा नारकीय प्राणियों का समुदाय ही सिद्ध होगा। ब्रह्माण्ड में जो कुछ वस्तुगत, भावगत तथा व्यक्तिगत दिव्यता है, वह लौकिक तथा पारलौकिक उत्कर्ष के ख्यापक वेदसम्मत कर्मोपासना के कारण ही है। जन्ममृत्यु की अजस्रपरम्परा का आत्यन्तिक उच्छेदप्रद कैवल्य की सिद्धि का वेदान्तविज्ञान के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है। विश्व को एक और शून्य का विज्ञान ऋगादि वेदों से ही प्राप्त हुआ ; तद्वत् ग्रह, नक्षत्र और ग्रहणादि का विज्ञान वेदादि शास्त्रों से ही सुलभ हुआ। माया और आत्मा के संयोग से सिद्ध काल के परमाणु काल से लेकर परार्धकाल पर्यन्त प्रभेद का परिज्ञान , सृष्टि -- स्थिति तथा संहृति का विज्ञान वैदिक वांगमय के अनुशीलन से ही सम्भव है। प्रकाश की गति का विज्ञान , आकाशादि अतीन्द्रिय वस्तुओं का विज्ञान एवम् धर्म , अर्थ , काम और मोक्षरूप पुरूषार्थ चतुष्टय का विज्ञान , देहातिरिक्त आत्मा का विज्ञान , पूर्वजन्म और पुनर्जन्म का विज्ञान , ऊर्ध्व लोकों में जीव के गमन रुप उत्क्रमण का विज्ञान , लोक -- लोकान्तरों का विज्ञान , देव -- पितृ -- प्रेतादि चौरासी लक्ष प्राणियों का विज्ञान , रत्नपरीक्षण -- नृत्य -- गीत -- वाद्य -- भवन -- अस्त्रशस्त्र , जल -- स्थल नभयानादि विविध कलाकौशल का विज्ञान , वृष्टियज्ञ तथा मौसम विज्ञान , अभ्रविज्ञान, आतपविज्ञान , मेघविज्ञान , विद्युत विज्ञान , नहरविज्ञान , बांधविज्ञान , कृषिविज्ञान , वनस्पति विज्ञान , अधिभूत , अध्यात्म और अधिदैव विज्ञान , योग और भोग का विज्ञान , भजनीय भगवत्तत्व और भक्ति का विज्ञान वैदिक वांगमय के परिशीलन से ही सम्भव है।


















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