देव यादव सी एन आई न्यूज़ बेमेतरा
बेमेतरा नवागढ़ विश्व में जिस तरह से संकर बीजों का प्रचलन खेती में बढ़ा है ठीक उसी तरह से संकर बीजों के रख-रखाव करने के लिए किसानों को आवश्यकता है कि वे ये सुनिश्चित करें कि गुणवत्तायुक्त स्वदेशी पौधों और सब्जियों की किस्मों को आने वाली पीढ़ी को भी उपलब्ध करवाया जा सके।
आज के समय में यदि आपसे सब्जी मंडी जाकर सब्जियां खरीदने के लिए लिस्ट तैयार करने के लिए कहा जाए तो आप उसमें प्रमुखता से खीरा, गाजर, शिमला मिर्च, बींस, टमाटर जैसी सब्जियों को अवश्य सूचीबद्ध करेंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि इन सब्जियों की एक किस्म ही बाजार में उपलब्ध है। यह एक अपवाद है कि बाजार में तीन रंग की शिमला मिर्च या दो तरह की बींस मिलती हैं लेकिन यदि आप आज से 100 वर्ष पहले यदि बाजार में जाते तो आपको नाना प्रकार की पत्तागोभी, मटर, टमाटर, कद्दू, मक्का आदि देखने को मिलते। यहां हम एक ऐसे ही शख्स की कहानी आपके साथ साझा करने जा रहे हैं जिन्होंने बीज रखने वालों के दर्द को समझा और खुद उस दिशा में अपने कदम बढ़ा दिए। वे और कोई नहीं बल्कि नवागढ़ के युवा किसान किशोर राजपूत हैं जिन्होंने जिला में ही नहीं बल्कि देश से भी विलक्षण किस्म के बीज एकत्रित कर उन्हें संरक्षित करने का सराहनीय कार्य किया है।
भूरी व बैंगनी मिर्च
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि नेशनल ज्योग्राफिक मैगजीन में वर्ष 2011 के जुलाई संस्करण में इस संदर्भ में छपा था कि 80 के दशक में हम विविधता की ओर तो बढ़े लेकिन हम 93 प्रतिशत तक वे सभी किस्में खो चुके हैं जिनका पहले कभी वजूद हुआ करता था। यह सन् 1983 की बात है। यदि यही सर्वे या शोध आज किया जाए तो हम पाएंगे कि सब्जियों में हमने 99 प्रतिशत तक विविधता खो दी है जिन्हें किसानों व बीज रखने वाले किसानों ने बरसों मेहनत कर संजोकर रखा था।
पहले के समय में यह होता था कि किसान अच्छी गुणवत्ता के पौधों का इस्तेमाल करते थे और उनके बीजों को अगले सीजन के लिए संरक्षित करते थे। इस क्षेत्र में कभी कोई बिजनेस मॉडल नहीं रहा जिसके तहत बीजों की संख्या को दोगुना करने का काम किया जाता हो। यदि बीज रखने वाला किसान अन्य किसान भाइयों के साथ इन बीजों को आपस में बांटता था तो वे किसान इन बीजों से अन्य गुणवत्तायुक्त बीज तैयार कर सकते थे।
किशोर राजपूत के अनुसार 60 के दशक में बीज उत्पादन को लाभ का धंधा माने जाना लगा लेकिन इसमें टिकाऊपन के जरूरी था कि किसान वापस से बीज कंपनियों के पास जाएं और उनसे अच्छे बीज लें। हालांकि यह कोई टिकाऊ बिजनेस मॉडल के रूप में नहीं उभरा क्योंकि किसान एक बार बीज लेकर स्वयं भी अच्छी किस्म के बीज तैयार कर सकता है।
इसको एक टिकाऊ व लाभ का धंधा बनाने के लिए बीज कंपनियों ने ऐसे बीज बनाने शुरू कर दिए जिनसे किसान अगले सीजन के लिए बीज तैयार नहीं कर सकते थे। यहीं से संकर व जीएमओ बीजों की उत्पत्ति हुई। आज बीज कंपनियां किसानों को संकर किस्म के बीज ही उपलब्ध करवाती हैं।
बीते 50 वर्षों में किसानों की बीजों को संरक्षित करने की प्रवृत्ति में पूरी तरह से बदलाव आ गया। आज यह चलन बन गया है कि किसानों को हर सीजन में बीज खरीदने ही पड़ते हैं।
सन 70 के दशक के अंत में वैज्ञानिकों ने किसानों को रासायनिक कृषि को अपनाने के लिए उकसाया। किसानों को उर्वरक व डीएपी छिड़कने के लिए बढ़ावा संकर किस्म के बीजों को अपनाने के लिए किसानों से आग्रह किया क्योंकि हमें जरूरत थी कि केंद्रीय खाद्य नीति बनाने और किसानों को उनके अधिकार देने की। वैज्ञानिकों को लगा कि वे सफलता हासिल की है।
किशोर राजपूत ने बताया कि पिछले 5 वर्षों से मैं ऐसे ही स्वदेशी बीजों की खोज में हूं और छत्तीसगढ़ व देश के दूर-दराज के इलाकों में जाकर मैंने उन्हें इकट्ठा किया है मेरे पास अभी सब्जियों, दलहन, तिलहन, धान, गेंहू,के स्वदेशी किस्म की बीज हैं।
सी एन आई न्यूज़ बेमेतरा छत्तीसगढ़ देव यादव 9098647395


















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