बिरसा, सालेटेकरी।बालाघाट जिला आदिवासी बहुल जिला है।जहां पर्याप्त मात्रा में वनसंपदा पाई जाती है।जिससे करोड़ो की आय सरकार और ठेकेदार दोनों मिलकर करते हैं।तेंदूपत्ता जिससे बीड़ी बनाई जाती है जो जबलपुर संभाग की बीड़ी पूरे देश मे प्रसिद्ध है।यहां के प्रमुख वनोपज में शामिल है। जिले की आबादी का एक बड़ा तबका है जिसमें आदिवासी प्रमुख रूप से शामिल हैं वह अपने आजीविका, विकास एवम कल्याण के लिए वनोपज एवं तेंदूपत्ता संग्रहण पर निर्भर रहता है जिससे इनको बारिश के चार महीनों के लिये खाने पीने की वस्तुओं को संग्रहण करने में मदद मिलती है।1980 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने सर्वप्रथम संग्राहकों को तेंदूपत्ता संग्रहण के मेहनताने के साथ बोनस भी देने की घोषणा की थी जो आज भी बदस्तूर जारी है।
समय समय राजनीतिक पार्टियां अपने फायदा के लिए संग्राहकों के मेहनताने को बढ़ाने का अपने वचन पत्र में शामिल करते है।ऐसा ही वादा कांग्रेस ने पिछले विधानसभा चुनाव में किया था जिसको कमलनाथ ने 2000 से बढ़ाकर2500 सौ प्रति हजार किया था।लेकिन वादा का क्या?राजनीतिक दलों के लिए वादा होता ही है तोड़ने के लिए।आदिवासियों के अनुसार तेंदूपत्ता संग्रहण पर मिलने वाला बोनस व चरणपादुका न मिलने के कारण हमें राजनीतिक दलों के द्वारा ठगा जाता है जो गलत है।दिन भर भूखे प्यासे रहकर जंगल झाड़ी में घूमकर एक एक तेंदूपत्ता का संग्रहण करते है जिससे सबसे ज्यादा सरकार और ठेकेदार कमाते हैं
और हमे 200 से 250/प्रति सैकड़ा के हिसाब से भुगतान कर इस पर मिलने वाला बोनस को साल दो साल बाद दिया जाता है जिससे हमें बहुत परेशानी होती है।मेहनताने के रूप में मिलने वाली मजदूरी अगर साल दो साल बाद मिले तो सभी को परेशानी व गुस्सा आना लाजिमी है।जब इस बारे में वनविभाग के अधिकारियों से संपर्क कर जानकारी चाही गयी तो अधिकारी ने वजट का बहाना बनाकर अपना पल्ला झाड़ लिया।सवाल यह उठता है कि सरकार के पास मजदूरी देने के लिए बजट नही है तो भोले भाले आदिवासियों को सब्जबाग ही क्यों दिखाते हो।तेंदूपत्ता संग्राहकों ने सरकार से मांग किया है कि हमे बोनस न देकर 500-600/रुपया प्रति सैकड़ा के हिसाब से तुरंत भुगतान किया जाय जिससे हमें व हमारे परिवार को दो वक्त की रोटी समय पर मिले।अब देखना यह है कि आदिवासियों की हिमायती बताने वाली सरकार इनकी मांगो पर कहाँ तक खरा उतरती है।
इनका कहना है--बोनस व चरणपादुका देने का कार्ययोजना सरकार करती है जिसके पास इसके लिये बजट नही है।
आर.एस. धुर्वे।एसडीओ बैहर


















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