नई दिल्ली - हिन्दू धर्म में सबसे शुभ और पुण्यदायी और सभी व्रतों में श्रेष्ठ देवउठनी एकादशी कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष यानि आज मनायी जाती है। इसे हरिप्रबोधिनी , देवोत्थान , देवप्रबोधिनी और ठिठुअन एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान शालिग्राम और तुलसी विवाह का धार्मिक अनुष्ठान भी किया जाता है। यह व्रत सभी प्रकार के पापों से मुक्ति दिलाने के साथ साथ सभी प्रकार की मनोकामनाओं को पूर्ण करता है। इस एकादशी का फल अमोघ पुण्य फलदायी बताया गया है। इस दिन वैष्णवों के साथ साथ स्मार्त श्रद्धालु भी बड़ी आस्था के साथ व्रत रखते हैं , इस दिन उपवास रखना बेहद शुभ माना जाता है वहीं निर्जल या जलीय पदार्थों पर उपवास रखना विशेष फलदायी है। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि देवउठनी एकादशी व्रत को व्रतराज की उपाधि दी गई है क्योंकि यह सभी व्रतों में सर्वश्रेष्ठ है और इससे सौभाग्य की प्राप्ति होती है। हिन्दू धर्म में एकादशी का व्रत बेहद महत्वपूर्ण होता है। पूरे वर्ष में चौबीस एकादशी होती हैं , लेकिन अगर किसी वर्ष मलमास है तो इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। कहा जाता है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी के दिन से श्रीहरि क्षीरसागर में विश्राम करने चले जाते हैं। चतुर्मास में उनके विश्राम करने तक कोई भी शुभ कार्य नही किये जाते हैं। चातुर्मास के समापन कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन देवउठनी-उत्सव होता है , इस एकादशी को ही देवउठनी कहा जाता है। देवउठनी एकादशी के दिन चतुर्मास का अंत हो जाता है और शादी-विवाह इत्यादि मांगलिक कार्य फिर से शुरू हो जाते हैं। इस एकादशी के दिन की शुरुआत सर्वार्थ सिद्धि नामक योग से हो रही है , ज्योतिषशास्त्र में इस योग को बेहद कल्याणकारी माना गया है। इस योग में किया गया कोई भी कार्य पूर्ण फलदायी और पूर्ण रूप से सफल होता है। देवउठनी एकादशी के दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु को जगाने का आह्वान कर भगवान विष्णु एवं माँ लक्ष्मी की पूजा आराधना की जाती है।
तुलसी विवाह की है परम्परा
देवउठनी एकादशी के दिन श्रद्धालुओं द्वारा घरों में चाँवल आटे से चौक बनाया जाता है। तुलसी माता चौरा के चारो ओर गन्ने का मंडप बनाकर विधि विधान से पूजन किया जाता है। इस दिन तुलसी माता को मेंहदी , मौली धागा , फूल , चंदन , सिंदूर , सुहाग के सामान की वस्तुयें , अक्षत , मिष्ठान और पूजन सामग्री आदि भेंट की जाती हैं। तुलसी और शालिग्राम का धूमधाम से विवाह कराया जाता है। आज के दिन तुलसी , शालिग्राम जी की पूजा होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तुलसी विवाह का आयोजन करने पर एक कन्या दान के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। भगवान शालिग्राम ओर माता तुलसी के विवाह के पीछे की एक प्रचलित कथा है।
तुलसी विवाह प्रचलित कथा
पौराणिक काल में राक्षस कुल में एक वृंदा नाम की लड़की थी। वृंदा बचपन से ही भगवान विष्णु जी की परम भक्त थी। जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जालंधर से हो गया , वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी। एक बार देवताओं और दानवों में युद्ध हुआ जब जालंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने कहा - स्वामी आप युद्ध पर जा रहे हैं आप जब तक युद्ध में रहेगें तब तक मैं पूजा में बैठकर आपकी जीत के लिये अनुष्ठान करुंगी और जब तक आप वापस नहीं आ जाते मैं अपना संकल्प नही छोडूंगीं। जालंधर तो युद्ध में चला गया और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गई। उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जालंधर को जीत ना सके , सारे देवता जब हारने लगे तो भगवान विष्णु जी के पास गये।सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि वृंदा मेरी परम भक्त है मैं उसके साथ छल नहीं कर सकता। देवता बोले - भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते हैं। जालंधर का भेष बनाकर भगवान सीधे वृंदा के महल में पहुंचे। वृंदा अपने पति को देखा वे तुरंत पूजा में से उठ गई और उनके चरण छू लिये। जैसे ही उनका संकल्प टूटा , युद्ध में देवताओं ने जालंधर को मार दिया और उसका सिर काटकर अलग कर दिया। वृंदा अपने पति के कटे सिर को अपने महल में देखकर बोली कि मेरे पति का सिर तो कटा पड़ा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है।उन्होंने पूछा - आप कौन हैं ? जिसका स्पर्श मैंने किया। तब भगवान अपने रूप में आ गये पर वे कुछ ना बोल सके यह देखते ही वृंदा सारी बात समझ गई। उन्होंने भगवान को पत्थर बन जाने का श्राप देते हुये कहा कि जिस प्रकार तुमने छल से मुझे पति वियोग दिया है , उसी प्रकार तुम भी अपनी स्त्री का छलपूर्वक अपहरण होने पर स्त्री वियोग सहने के लिये मृत्युलोक में जन्म लोगे। सभी देवता हाहाकार करने लगे , लक्ष्मी जी रोने लगीं और प्रार्थना करने लगीं। हालांकि देवताओं की विनती और माता लक्ष्मी की हालत को देखकर वृंदा ने पत्थर बनने का दिया श्राप वापस ले लिया , मगर भगवान विष्णु अपने किये का प्रायश्चित करना चाहते थे। उन्होंने वृंदा के शाप को जीवित रखने के लिये खुद का एक पत्थर स्वरूप प्रकट किया जो शालिग्राम कहलाया।अपने पति का सिर लेकर वे सती हो गई। उनकी राख से एक पौधा निकला तब भगवान विष्णु जी ने कहा- आज से इनका नाम तुलसी है और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा और मैं बिना तुलसी जी के प्रसाद स्वीकार नहीं करुंगा। तब से तुलसी जी की पूजा सभी करने लगे और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में किया जाता है। देवउठनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है। जो लोग तुलसी विवाह संपन्न कराते हैं , उनको वैवाहिक सुख मिलता है। इस व्रत के शुभ प्रभाव से शादी में आ रही सारी रुकावटें दूर होने लगती हैं और शुभ विवाह का योग जल्दी ही बन जाता है। तुलसी को धार्मिक अनुष्ठानों में विशेष महत्व दिया जाता है। तुलसी के पौधे का उपयोग यज्ञ , हवन , पूजन , कर्मकांड , साधना और उपासना के अलावा भोग , प्रसाद , भगवान के चरणामृत आदि में किया जाता है।

















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