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Thursday, May 12, 2022

पैसे का भंडार, मनरेगाकर्मी आंदोलन को लाचार

 

09/05/2022

पैसे का भंडार, मनरेगाकर्मी आंदोलन को लाचार



*नियमित करने में राज्य सरकार को नहीं आएगा कोई भी वित्तीय भार*


*विगत 3 वर्षों में 163 करोड़ रुपए मनरेगा में राज्य सरकार को प्राप्त नहीं हो पाया*


*मनरेगाकर्मियों की हड़ताल 36 दिनो से लगातार जारी*


........- छत्तीसगढ़ मनरेगा कर्मचारी महासंघ के तत्वाधान में प्रदेश भर के मनरेगा योजना अंतर्गत कार्यरत अधिकारी, कर्मचारी एवं रोजगार सहायक 4 अप्रैल से निरंतर हड़ताल पर है । 

     29 अप्रैल को माननीय मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल जी से डेलिगेशन टीम ने मुलाकात के बाद 6 मई को पंचायत एवम ग्रामीण विकास विभाग सचिव की अध्यक्षता में कमेटी का गठन कर दिया गया है। 


*छत्तीसगढ मनरेगा कर्मचारी महासंघ के जिला अध्यक्ष  श्री शिवेष वर्मा का कहना है कि इससे पहले भी संविदा कर्मचारियों की मांगों को लेकर समिति का गठन किया गया है किंतु उनका भी प्रतिवेदन नहीं आया है, जब तक शासन स्तर से कोई समाधान कारक रिपोर्ट नहीं आ जाती तब तक हड़ताल जारी रहेगा।*


*रायपुर* - एक पुरानी कहावत है " *मेहनत करे मुर्गा अंडा खाए फकीर*" अर्थात दूसरे की मेहनत पर कोई दूसरा वाहवाही लुटे। और तो और मुर्गे को इस डर से भूखा रखा जाए कि मुर्गा मेहनत  करना  ना बंद कर दे? जी हां छत्तीसगढ़ राज्य में मनरेगाकर्मियों की भी स्थिति बिल्कुल इस कहावत की भांति नजर आ रही  है। हमने जब महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना अंतर्गत राज्य सरकार को प्राप्त होने वाले राशि का अवलोकन किया है तो हमें चौंकाने वाले आंकड़े प्राप्त हुए हैं। विगत 3 वर्षों में छत्तीसगढ़ राज्य  मनरेगा अंतर्गत भारत सरकार से प्राप्त होने वाली लगभग 163 करोड़ रुपए की बड़ी राशि खर्च करने में असमर्थ रही हैं। इस राशि का उपयोग राज्य सरकार मनरेगा कर्मियों के वेतन भुगतान के अलावा अन्य खर्चे में  कर सकती थी। संभवत ऐसी ही परिस्थितियों के कारण 15 साल से संविदा जैसी कुप्रथाओं का दंश झेल रहे ये कर्मचारी विगत 35 दिन से आंदोलन की राह पर अडिग है। 

*वादे अनुरूप सकारात्मक पहल की दरकार*

         महात्मा गांधी नरेगा योजना अंतर्गत कार्य करने वाले अधिकारी, कर्मचारी एवं रोजगार सहायकों का वेतन वर्ष भर में प्रदेश स्तर पर व्यय होने वाली राशि के 6% से किए जाने के भारत सरकार द्वारा निर्देश है। प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्तमान में केवल 3% राशि का उपयोग वेतन में किया जा रहा है, शेष 3%  की राशि से अन्य व्यय में  की जा रही है या फिर एक बड़ी राशि प्रतिवर्ष खर्च नहीं किए जाने की स्थिति बनी हुई है। 

       विगत 3 वर्षों के आंकड़े को गौर करें तो छत्तीसगढ़ ने मनरेगा अंतर्गत भारत सरकार से प्राप्त होने वाली लगभग 163 करोड़ रुपए की बड़ी राशि खर्च करने में असमर्थ रही। यदि प्रशासन अपनी मंसा सकारत्मक कर लेवे तो वेतन भुगतान राशि मे किसी भी प्रकार से वित्तीय भार नही आयेगा। 6% की राशि अभी भी समस्त कर्मियो को वेतन भुगतान करने मे सक्षम है।

*राष्ट्रीय स्तर पर कई कीर्तिमान स्थापित किन्तु नहीं बड़ा वेतन* -

          भारत सरकार, ग्रामीण विकास मंत्रालय, नई दिल्ली के द्वारा विभिन्न वर्षों में महात्मा गांधी नरेगा के उत्कृष्ट क्रियान्वयन हेतु छत्तीसगढ़ राज्य को राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किये गए हैं, जो इन कर्मचारियों की मेहनत और योजना के प्रति समर्पण का साक्ष्य हैं।

राज्य स्तर के राष्ट्रीय पुरस्कार के अंतर्गत प्रदेश को महात्मा गांधी नरेगा के अंतर्गत अब तक कुल 09 राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। 

जिला स्तर के राष्ट्रीय पुरस्कार के तहत योजना के क्रियान्वयन में प्रभावी पहल के लिए राज्य में अब तक 13 जिलों को पुरस्कृत किया गया है।

विकासखंड स्तर के राष्ट्रीय पुरस्कार के अंतर्गत जियो-मनरेगा इनीशिएटिव्ह के तहत जी.आई.एस. संपत्ति पर्यवेक्षण क्रियान्वयन में जांजगीर-चांपा जिले का पामगढ़ विकासखंड देशभर में दूसरे स्थान मिला।

ग्राम पंचायत स्तर के राष्ट्रीय पुरुस्कार के अंतर्गत महात्मा गांधी नरेगा कार्यों के क्रियान्वयन में उत्कृष्टता के लिए प्रदेश में अब तक कुल 09 ग्राम पंचायतों को पुरुस्कार प्रदान किया गया है।

  नियमित कर्मचारी के अलावा अन्य गिभागों में संविदा पर कार्यरत अन्य कर्मचारियों के वेतन समय - समय पर निर्धारित मापदंड अनुसार वेतनवृद्धि होते रहते है, किंतु मनरेगाकर्मियों का वेतन साढ़े 3 वर्षो से नहीं बड़ा है।

*अल्प वेतन पर काम का बोझ - टुटा सब्र*

मनरेगा में कार्यरत यह कर्मचारी राज्य भर में महात्मा गांधी नरेगा योजना अंतर्गत लगभग 4000 करोड़ रुपए के बड़े बजट राशि के कार्यों का संचालन सफलतापूर्वक करते हैं।  इसके  अलावा राज्य सरकार की महत्वकांक्षी योजना नरुवा, गरुवा, घुरुवा और बाड़ी के साथ गोधन न्याय योजना के संचालन  की जिम्मेदारी भी इन्हीं कर्मचारियों के मत्थे मढ़ दी गई है, जिसके संचालन के लिए इन्हें अलग से ना ही किसी प्रकार का वित्तीय लाभ दिया गया है और ना ही अन्य खर्च करने के लिए दिया जा रहा है।

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