नागपंचमी देता है सर्पों के संवर्धन तथा संरक्षण का संदेश-संत श्री रामबालक दास जी
सी एन आई न्यूज़ से संजू महाजन
थानखम्हरिया- हिंदू धर्म में प्रकृति पूजा का विशेष स्थान है। जीवों को संरक्षण देने के ध्येय से ही गौ पूजा, नाग पूजा, नंदी पूजा, गरूण पूजा आदि की जाती है। भगवान शिव के हाथों में सर्पों का कंगन, गले में सर्पों की माला, जटा के ऊपर सर्प की कलगी यहाॅ तक कि यज्ञोपवीत के स्थान पर भी सर्प और कमर में व्याल चर्म दर्शाते हैं कि सर्प भगवान शिव को कितने प्रिय हैं। ऐसे सर्पों की न केवल पूजा बल्कि इनके संरक्षण तथा संवर्धन का भी संकल्प हमें लेना चाहिये।
पाटेश्वरधाम के आनलाईन सतसंग में पुरूषोत्तम अग्रवाल की जिज्ञासा का समाधान करते हुये संत श्री रामबालकदास जी ने कहा कि जीवों को महत्व प्रदान करने ही भगवान गणेश ने मूसक, विष्णु भगवान ने गरूण, कार्तिक ने मोर, माॅ दुर्गा ने शेर, शिव जी ने नंदी को अपना वाहन बनाया। बाबाजी ने कहा सर्प शिव का आभूषण बनकर स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है। शिव जी को भी सर्पों से शीतलता मिलती है। सर्प देखते ही मनुष्य भयभीत हो जाता है तथा अनिष्ट की आशंका करने लगता है लेकिन सर्प बहुत सुंदर जीव है दिखने पर इसे प्रणाम करना चाहिये तथा इन्हें नुकसान पहुॅचाने की नहीं बल्कि इनकी सुरक्षा का भाव जागृत होना चाहिये। बाबाजी ने कहा सर्प तो क्या कोई भी जीव हमारा दुश्मन नहीं होता। हमारे द्वारा इन्हें नुकसान पहुॅचाये जाने पर अपनी सुरक्षा में ये हम पर हमला करते हैं। वासुकी नाग ने भगवान शंकर को कठोर तप से प्रसन्न किया जिससे उसे भगवान का आभूषण बनने का सौभाग्य मिला। बाबाजी ने बताया कि शिव जी द्वारा कालकूट जहर पीते समय इसकी कुछ बूंदें धरती पर गिरने लगी तब धरती की रक्षा के लिये कुछ जीवों ने इसे पी लिया यही जहर सर्प, बिच्छू आदि जीवों में विद्यमान है। शिव ने सर्पों को आभूषण बनाकर यह संदेश भी दिया कि जिसका कोई नहीं उसका शिव है।
संत भगवान ने इस बात पर दुख व्यक्त किया कि सत्य, अहिंसा, धर्मपालक के रूप में विख्यात राम, बुद्ध, महावीर के देश भारत में नागों की तस्करी की जाती है जिससे सर्पों की हजारों प्रजातियाॅ लुप्त हो चुकी हैं। चमड़े के व्यापार के लिये प्रतिवर्ष लाखों सर्पों को मारा जाता है। मनुष्य अपनी सुंदरता के लिये प्रकृति की सुंदरता की बलि ले रहा है। यदि हम चमड़ों के बेल्ट, पर्स, जूता, बैग आदि का त्याग करने का संकल्प लें तो लाखों जीव जंतुओं के प्राणों की रक्षा की जा सकती है। बाबाजी ने कहा कि नागों की पूजा कर इनके संरक्षण तथा संवर्धन में अपना योगदान दें। यदि इनकी पूजा न कर सकें तो अपने अंदर व्याप्त इनके प्रति कुविचारों का त्याग करें। सर्प हमारे शत्रु नहीं मित्र हैं।



















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