छत्तीसगढ़ के तीज - त्योहारों में ऋषि व कृषि संस्कृति का प्रभाव - पीसी लाल यादव
छत्तीसगढ़ - नई पीढ़ी को छत्तीसगढ़ के पुरातत्व, कला व संस्कृति से अवगत कराने तथा अपनी धरोहरों के संरक्षण - संवर्धन के उद्देश्य से 27 से 31 जनवरी तक कार्यशाला का आयोजन रायपुर में किया गया। संचालनालय पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय द्वारा महंत घासीदास संग्रहालय के प्रेक्षागृह में आयोजित उक्त कार्यशाला का विषय था "छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर एवं उनका संरक्षण"।
इस कार्यशाला में मध्य छत्तीसगढ़ के विभिन्न महाविद्यालयों से 60 छात्र-छात्राओं एवं अध्यताओं ने 5 दिनों तक अपनी उपस्थिति दर्ज की। कार्यशाला में पुरातत्व, कला, साहित्य, संस्कृति, प्राचीन इतिहास एवं नृतत्व शास्त्र को लेकर अनेक सत्रों में विषय विशेषज्ञों ने छात्रों का मार्गदर्शन किया और उनके द्वारा पूछे गए प्रश्नों का समुचित उत्तर दिया ।
इसी कड़ी में 29 जनवरी को गंडई के सेवानिवृत्त व्याख्याता, साहित्यकार व संस्कृति कर्मी डॉ.पीसी लाल यादव को व्याख्यान हेतु आमंत्रित किया गया। स्वागत व सम्मान के पश्चात डॉ.यादव ने विभाग द्वारा प्रदत्त विषय "मध्य छत्तीसगढ़ के तीज - त्यौहार और लोक जीवन में उनका महत्व" विषय पर अपना शोध पूर्ण व्याख्यान प्रस्तुत किया।
उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में ऋषि संस्कृति व कृषि संस्कृति का प्रभाव है। छत्तीसगढ़ी लोक जीवन प्रकृति का प्रेमी व उसका पुजारी है। इसलिए यहां के तीज त्योहारों में प्रकृति और कृषि संस्कृति का पूर्ण प्रभाव परिलक्षित होता है। अकती, हरेली, कमर छठ, आठे कन्हैया, भोजली, तीजा पोरा,गौरा, देवारी, गोवर्धन पूजा, छेरछेरा आदि सभी त्योहारों में कृषि संस्कृति के दर्शन होते हैं।
ये त्योहार लोक जीवन की अनमोल धरोहर हैं। लोक जीवन का मूल उद्देश्य है प्रकृति का संवर्धन और संस्कृति का संरक्षण।डॉ. यादव ने विभिन्न लोकगीतों एवं लोक कथाओं का उदाहरण प्रस्तुत कर नई पीढ़ी को धरोहरों के संरक्षण के लिए प्रेरित किया। कार्यशाला में उपस्थित प्रतिभागियों व अध्यताओं ने डॉ. यादव के विषय प्रतिपादन की प्रशंसा की। उपसंचालक पुरातत्व, डॉ. पी. सी. पारख व प्रभात सिंह जी ने शोध पूर्ण वक्तव्य के लिए डॉ. पीसी लाल यादव का विभाग की ओर से आभार व्यक्त किया






















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