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Sunday, September 7, 2025

श्राद्ध-पितृपक्ष २०२५-श्रृद्धा पूर्वक अपने पूर्वजों को उनके द्वारा किए गए अच्छै कामों को स्मरण करके उनकी आत्माओं को तर्पण देना चाहिए ।

 श्राद्ध-पितृपक्ष २०२५-श्रृद्धा पूर्वक अपने पूर्वजों को उनके द्वारा किए गए अच्छै कामों को स्मरण  करके उनकी आत्माओं को तर्पण देना चाहिए ।




सी एन आइ न्यूज-पुरुषोत्तम जोशी। 

पितृपक्ष  2025-  हि़ंदू धर्म मे पितृपक्ष का अत्याधिक महत्व होता है। ७ सितम्बर पूर्णिमा से श्राद्ध हैं, जो कि अमावस्या २१ सितम्बर तक रहेगा!

श्राद्ध बहुत महत्वपूर्ण है, और श्राद्ध में सभी मनुष्यों को अपने पूर्वजों को उनके द्वारा किए गये अच्छे कामों को स्मरण करके उनकी आत्माओं को तर्पण देना चाहिए!

धर्म शास्त्रों का स्पष्ट मत है कि मृत्यु के पश्चात साधारण कर्म करने वाली जीवात्माएं वासनाओं के कारण पृथ्वी के वायु मंडल में बंधी रहती हैं और तीन प्रकार के जीवों जलीय जीव थलीय जीव आकाशचारी जीवों के रूप में स्थावर और जंगम रूप में योनियों को भोगते हैं।

श्राद्ध के समय जो तिल और जौ के पिंड बनाए जाते हैं और जो भोजन दिया जाता है, वो मृत जीवात्माओं के जीवित शरीरों को दिया जाता है। एक पिंड जल में -- जलीय जीवात्माओं के लिए।

दूसरा थल में --- थलीय जीवों के लिए।

तीसरा आकाश में -- पंक्षियों के लिए।

इसके अलावा भी दो पिंड और जड वृक्षों और भूत कीट- चींटी आदि के लिए बनाए जाते हैं ;

गांय - कुत्ता - कव्वा -- आदि आसपास सुलभता से मिल जाते हैं अतः उनको श्राद्ध में ये भोज्य भक्ष्य दिये जाते हैं।

श्राद्ध -- प्रकृति प्रेम और पशु तथा वन्य प्राणी प्रेम से जुडा पवित्र त्यौहार है। श्राद्ध के विषय में कहा जाता है, कि मांसाहार का सबसे बडा पाप यदि किसी को लगता है, तो वह महापाप श्राद्ध में किये गये मांसाहार का होता है ।


अर्थात श्राद्ध में किया गया मांसाहार मनुष्य के आने वाली पीढ़ियों का नाश कर देता है।

जानकार ब्राह्मण को घर पर बुलाकर श्राद्ध की प्रक्रिया सम्पन्न करें -

यह एक घंटे की प्रक्रिया है इस प्रक्रिया में अपने पूर्वजों और पितरों को स्मरण करें एसा करने से आपके कुल में यदि कोई पवित्र आत्मा पित्र लोक या स्वर्ग लोक में है वह संतान के रूप में पुनः आपके परिवार में जन्म लेती है।

श्राद्ध के लिए गया और बद्रीनाथ दो पवित्र तीर्थस्थलों का विशेष महत्व है! बद्रीनाथ को ब्रह्मरंध्र क्षेत्र और बद्रीनाथ को आज्ञा तीर्थ भी कहा जाता है!

जिनकी आयु ६० वर्ष से अधिक हो गयी है, और जिनके बच्चों का विवाह हो गया है; वे गयाजी में जाकर पिण्ड दान करके पिण्ड दान से मुक्त हो जाते हैं, किंतु जो गया में पिण्ड दान करे वह अन्तिम पिण्ड दान बद्रीनाथ में जाकर कपाल तीर्थ में कर सकता है, किंतु यदि कोई बद्रीनाथ में पिंड दान कर दे तो वह सभी पिंड दान से मुक्त हो जाता है! इन स्थानों पर पिंड दान घर का बड़ा भाई जिसकी आयु ६० वर्ष से अधिक है, जिसके बच्चों का विवाह हो गया है, छोटे भाइयों के साथ जाकर कर सकता है!

इसमें अमावस्या की तिथि विशेष है, इसमें सभी पित्रों का आह्वान करके उन्हें वयोवृद्ध और वरिष्ठ मनुष्य अपने पित्रों को जीवन का अन्तिम पिंड दान दे सकते हैं;

पित्रों को वर्ष में एक बार श्राद्ध के समय पिण्ड दान अवश्य करें और उनके द्वारा आपके लिए किए गये अच्छे कार्यों का स्मरण करें

आपके लाखों पित्र जल- थल  वायु आदि प्राणियों के रूप में जन्म लेते हैं, और कुछ देवयोनि और पितृलोक में जाते हैं, अतः वर्ष में एक बार उन्हें अवश्य स्मरण करें; श्राद्ध में भूलकर मांस - मदिरा और स्त्री का सेवन ना करें अन्यथा पित्र दोष लगता है, और बीमार और अल्पायु संतान उत्पन्न होती है!

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