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Saturday, November 8, 2025

राजनांदगांव हॉकी की नर्सरी रही है। हॉकी के इस बगीचे में एक से एक महकदार फूल हुए हैं। हाॅकी शताब्दी वर्ष के अवसर पर हम दिल से हमारे हाॅकी खिलाड़ियों को उनके बेहतरीन योगदान के लिए याद कर रहें हैं !

 राजनांदगांव हॉकी की नर्सरी रही है। हॉकी के इस बगीचे में एक से एक महकदार फूल हुए हैं। 



हाॅकी शताब्दी वर्ष के अवसर पर हम दिल से हमारे हाॅकी खिलाड़ियों को उनके बेहतरीन योगदान के लिए याद कर रहें हैं !  

सी एन आइ न्यूज-पुरुषोत्तम जोशी। 

छ.ग.प्रदेश - राजनांदगांव हाॅकी की पाठशाला है। राजनांदगांव के हाॅकी के मैदान से सैकड़ों उत्कृष्ट खिलाड़ी निकलकर हाॅकी की दुनिया में राजनांदगांव का नाम रौशन किया है।




 राजनांदगांव के गली - गली में इन होनहार खिलाड़ियों की स्तुतिगान होते रहती है, नतीजतन सरकार -‌ प्रशासन  गली - गली के जनश्रुति - जनभावना को शहर के गौरवपथ पर हाॅकी के इन विभूतियों की प्रतिमाएं स्थापित कर इन्हें जीवंत - अमर बना दिया है। 




हाॅकी के हमारे कालजयी खिलाड़ी जादूगर (ध्यानचंद) एयरमैन (एरमन बैस्टियन) बाज़ीगर (रामनारायण पटेल) के नाम को आने वाली नस्लें, रहती दुनिया तक बड़ी श्रद्धा, बड़े अकीदत और बेहद शिद्दत के साथ याद करेंगे।



इसे खेल में राजनीति का दखल ही कहा जायेगा कि हॉकी के इन महान विभूतियों के अतुलनीय योगदान के बावजूद आज भी राजनांदगांव हाॅकी की पाठशाला (नर्सरी) ही है, हाॅकी का विश्वविद्यालय कहां बन पाया है ?


हाॅकी का बाज़ीगर रामनारायण पटेल !


राजनांदगांव का राजा महंत सर्वेश्वरदास हाॅकी के बेहतरीन खिलाड़ी थे, उनकी रियासत के  दीवान जिस मोहल्ले में रहते थे, उसी मोहल्ले के बिसराम पटेल के यहां 19 जून 1930 को बालक रामनारायण का जन्म हुआ था। बिसराम पटेल के ज्येष्ठ पुत्र रामनारायण पटेल हाॅकी की दुनिया का बाज़ीगर साबित हुआ है। रामनारायण पटेल को राजनांदगांव की जनता इस मायने में बाज़ीगर कहती, कि वह अत्यंत कठिन और विषम परिस्थितियों में भी अपनी हारती टीम को पलक झपकते जीत में बदल देते थे। रामनारायण पटेल के पिता बिसराम पटेल के सभी पुत्र स्पोर्ट्स क्षेत्र के प्रतिभावान खिलाड़ी रहे हैं। रामनारायण पटेल के भाई भुवनलाल पटेल हाॅकी के उत्कृष्ट खिलाड़ी होने की योग्यता पर राउरकेला इस्पात संयंत्र में नौकरी मिली थी, दूसरे भाई कुंजबिहारी पटेल को उम्दा खिलाड़ी होने के कारण कोरबा के एनटीपीसी में नौकरी मिली थी, रामनारायण पटेल के एक और भाई रामबिलास पटेल भिलाई इस्पात संयंत्र में नौकरी पर रखे गये थे, मसलन पूरा का पूरा परिवार स्पोर्ट्स पृष्ठभूमि के रहे हैं। हाॅकी के बाज़ीगर रामनारायण पटेल के न केवल भाई अपितु रामनारायण पटेल के सभी पुत्रों के रगो में हाॅकी का खेल रक्त बनकर धमनियों शिराओं में बहते रहीं है। यह तथ्य जानकर आप रोमांचित हो उठेंगे कि रामनारायण पटेल का बड़ा बेटा बालमुकुंद पटेल भारतीय रेल में टीसी है, उनके दूसरे क्रम का पुत्र गुणवंत पटेल भी भारतीय रेल के टेलीकॉम डिपार्टमेंट में सेवारत हैं, उनका एक बेटा एयर इंडिया छोड़कर भारतीय रेल के दक्षिण - पूर्व मध्य रेल्वे में सेवारत हैं। उनका एक बेटा ऋषि पटेल जूनियर हाॅकी इंडिया टीम में अपनी कला का जौहर दिखाकर अच्छी पोस्ट पर सेवाएं दे रहे थे, लेकिन अफ़सोस अब वह इस दुनिया में नहीं है।


हाॅकी का एयरमैन बेस्टमैन !


अन्तर्राष्ट्रीय हाॅकी खिलाड़ी एरमन राॅक बैस्टियन का जन्म 8 सितम्बर 1934 को बीएनसी मिल्स के बड़े बाबू (हैड क्लर्क) जोसेफ बैस्टियन के मिलचाल वाले आवास में हुआ था। एरमन हाॅकी खेल के सेन्टरफार्वड पोस्ट पर खेलते हुए अपनी अद्भुत कला का प्रदर्शन करते थे, स्टिक से गेंद को डब्लिंग करते हुए, बड़ी कुशलता से विरोधी टीम को छकाते हुए बाल को स्टिक के साथ लेकर हवा के मानिंद भागने के उनके अद्वितीय क्षमता को देखकर हाॅकी प्रेमी की जनता के साथ  - साथ फिल्म एक्टर रज़ा मुराद ने अपनी प्रभावी और बुलंद आवाज में जोर - जोर  से चिल्लाकर समूचे स्टेडियम को गूंजा दिया था, बरबस कह उठे यह केवल एरमन बैस्टियन नही बल्कि एयरमैन - बेस्टमैन भी है।


प्रतिभाशाली एरमन राॅक बैस्टियन की ही तरह उनकी औलादें भी हाॅकी के 100×50 मीटर मैदान के इतर विभिन्न विधाओं में फर्श से अर्श तक एरमन बैस्टियन फैमिली का नाम रौशन किया है। एरमन की बड़ी पुत्री अर्चना बैस्टियन (विवाह पश्चात अर्चना जूलियस शाह) मध्यप्रदेश हाॅकी टीम की उत्कृष्ट खिलाड़ी का खिताब पाकर वर्तमान में भिलाई इस्पात संयंत्र के कार्मिक विभाग में काम करते हुए हाॅकी के नई पौध को वृक्ष पल्लवित करने के लिए दिन - रात अपना पसीना सींच रही है। एरमन बैस्टियन की छोटी बेटी अर्पणा जाॅन शिक्षा के क्षेत्र में अलख जगाकर भिलाई की प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान मार ग्रेगोरियस मेमोरियल स्कूल में कम्प्यूटर की पारंगत शिक्षिका है। एरमन बैस्टियन का पुत्र आनंद बैस्टियन भी अपने पिता की अर्जित यश धरोहर को अपेक्षित सम्मानपूर्वक सहेजते हुए बैस्टियन परिवार की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। पेशे से सिविल इंजीनियर आनंद बैस्टियन अपने पूज्य पिताजी को अपना आदर्श, अपना हीरो मानते हैं। यहां यह लिखना गौरतलब होगा कि बैस्टियन परिवार से परिवारिक निकटता के कारण एरमन बैस्टियन ने आदरणीय कनक तिवारी से आग्रहपूर्वक कहने से एरमन बैस्टियन के पुत्र आनंद का नाम उन्होंने ही रखा था।


हमारे प्यारे खिलाड़ी एरमन बैस्टियन को हाॅकी के क्षेत्र में प्राप्त राष्ट्रीय - अन्तर्राष्ट्रीय उपलब्धियों का यदि वर्णन करना चाहूं तो भी नहीं कर पाऊंगा क्योंकि उनकी उपलब्धियां हनुमान जी की पूंछ की तरह अंतहीन है। लेकिन कतिपय तथ्यों का उल्लेख करना श्रेयस्कर है, वाक्या 1960 का है, रोम के हाॅकी ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व एरमन बैस्टियन ने किया था भारतीय टीम के शानदार प्रदर्शन के बूते इस ओलंपिक में रजत पदक जीता था। एरमन बैस्टियन के हाॅकी के क्षेत्र में उनके योगदान और उपादान को फिर किसी अवसर पर पृथक से लिखने का प्रयास अवश्य करूंगा।


हाॅकी का जादूगर मेजर ध्यानचंद !


मेजर ध्यानचंद का असली नाम ध्यान सिंह बैस था। ध्यानचंद के पिता अंग्रेजी फौज में सिपाही थे ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद में हुआ था। सोने की चिड़िया कहें जाने वाले भारत मे हॉकी के स्वर्णयुग की शुरुआत पराधीन भारत से होती है। सन् 1928 में जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था, लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय हाॅकी के मैदान में भारत पूरी स्वतंत्रता के साथ हाॅकी का कीर्तिपताका लहराते हुए भारत अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीतकर चैम्पियन बन गया। इसके बाद 1932 मे स्वर्णपदक जीतकर दूबारा चैम्पियन बना। 1936 में बर्लिन को दुल्हन की तरह सजाया गया क्योंकि जर्मनी और भारत के मध्य अन्तर्राष्ट्रीय चैम्पियनशीप के लिए हॉकी का फायनल मैच खेला जाना था। इस फायनल मैच के मुख्य अतिथि एडोल्फ़ हिटलर थे। बर्लिन के इस फायनल मैच को जान लेना बेहद दिलचस्प है, भारत आजाद होने के अगले ही साल 1948 में स्वर्णपदक जीतकर चैम्पियन बना, इसके बाद 1952, 1956 मे भी *स्वर्णपदक* जीतकर लगातार चैम्पियन बनता रहा है, 1968 - 1972 मे जुगनू का खिताब जीतकर भारत हॉकी के दुनिया का सिरमौर बना गया।


एडोल्फ़ हिटलर के उस दावे को कि जर्मनी भारत से कभी नही हारेगी ध्यानचंद ने जर्मनी को 8 - 1 से पराजित कर तानाशाह हिटलर के दावे को सदा के लिए हरा दिया। यह ऐतिहासिक फायनल मैच 14 अगस्त 1936 होना था, लेकिन बारिश की वजह से यह मैच स्थगित कर दी गई। जब फायनल मैच प्रारंभ हुई तो बारिश तो थम चुकी थी लेकिन मैदान गीला होने के कारण ध्यानचंद ने पूरा मैच बगैर जूते के नंगे पांव खेला था। 16 अगस्त 1936 को जब ऐतिहासिक पुरूष्कार वितरण समारोह मे हिटलर के हाथों ध्यानचंद पदक लेने गये तो हिटलर की नज़र ध्यानचंद के पैरों पर जा टिकी जहाँ उनके जूते से एक अंगूठा बाहर झाँक रहा था, मानो ध्यानचंद का अंगूठा इतराकर हिटलर से कह रहा हो कि हमने आपके दावे की धज्जियां उडा़कर रख दिया। पुरूस्कार देते हुए हिटलर ध्यानचंद की ओर मुखातिब होकर पूछने लगे ...


हिटलर - क्या करते हो ?

ध्यानचंद - भारतीय सेना मे हूं

हिटलर - सेना मे क्या हो

ध्यानचंद - लांस हूँ

हिटलर - जर्मनी सेना ज्वाईन करलो ऑफिसर बना दिए जाओगे।

मै भारत का एक खिलाड़ी सिपाही हूँ खेल के जरिये अपने देश भारत का नाम विश्वमंडल पर रौशन करना चाहता हूँ, मुझे अपने भारत पर गर्व हैं। इतना सुनते ही हिटलर जैसे सबकुछ हारकर जीतने वाले ध्यानचंद के गले मे स्वर्णपदक डाला और पराजित मन से अपने राष्ट्रपति भवन की ओर चल दिए।


उम्मीद है, हमारा शहर एक दिन हाॅकी का आदर्श शहर बनेगा। इस शहर के अतीत और इतिहास में हाॅकी के अनगिनत नामचीन, गुमनाम खिलाड़ियों - प्रेमियों की वर्षो की अथक परिश्रम और प्रयास रहा है।


अंसार भाई राजनांदगांव की कलम से ।

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