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Sunday, April 12, 2026

दक्षता, निष्पक्षता और न्याय के प्रति सतत समर्पण ही न्यायपालिका की वास्तविक शक्ति को परिभाषित करते हैं – मुख्य न्यायाधीश माननीय श्री न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा न्यायिक अधिकारियों के लिए एक दिवसीय संभागीय सेमीनार का हुआ आयोजन आधुनिक कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर

 दक्षता, निष्पक्षता और न्याय के प्रति सतत समर्पण ही न्यायपालिका की वास्तविक शक्ति को परिभाषित करते हैं – मुख्य न्यायाधीश माननीय श्री न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा



न्यायिक अधिकारियों के लिए एक दिवसीय संभागीय सेमीनार का हुआ आयोजन


आधुनिक कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर



कवर्धा 11 अप्रैल 2026। दुर्ग संभाग के न्यायिक अधिकारियों हेतु एक दिवसीय संभागीय न्यायिक सेमीनार का आयोजन छत्तीसगढ़ राज्य न्यायिक अकादमी द्वारा जिला न्यायालय, दुर्ग में किया गया। इस सेमीनार में दुर्ग संभाग के पाँच सिविल जिलों से कुल 92 न्यायिक अधिकारियों ने सहभागिता की। 



कार्यक्रम के मुख्य अतिथि माननीय श्री न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा, मुख्य न्यायाधिपति, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय एवं मुख्य संरक्षक, छत्तीसगढ़ राज्य न्यायिक अकादमी द्वारा न्याय एवं विधिक ज्ञान के प्रकाश का प्रतीक दीप का प्रज्वलन कर सेमीनार का शुभारंभ किया गया। सेमीनार में माननीय श्रीमती न्यायमूर्ति रजनी दुबे, तथा माननीय श्री न्यायमूर्ति रवीन्द्र कुमार अग्रवाल, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की भी गरिमामयी उपस्थिति रही।


माननीय मुख्य न्यायाधिपति ने नव अधिनियमित आपराधिक कानूनों के महत्व पर बल देते हुए कहा कि ये कानून आपराधिक न्याय प्रणाली के आधुनिकीकरण की दिशा में एक परिवर्तनकारी कदम हैं, जिनमें तकनीकी प्रगति का समावेश किया गया है तथा अधिक प्रभावी और पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया गया है। न्यायिक अधिकारियों को इन अधिनियमों के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु उनका स्पष्ट एवं व्यावहारिक समझ विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया गया।


सेमीनार के विषयों पर प्रकाश डालते हुए माननीय मुख्य न्यायाधिपति ने कहा कि चयनित विषय अत्यंत व्यावहारिक महत्व के हैं तथा ये निचली अदालतों के समक्ष आने वाली दैनिक चुनौतियों को प्रतिबिंबित करते हैं। परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138 के अंतर्गत प्रकरणों के संदर्भ में उन्होंने शीघ्र निराकरण हेतु नवाचारी प्रकरण प्रबंधन तकनीकों एवं उपकरणों को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया, जिससे प्रक्रियात्मक निष्पक्षता बनाए रखते हुए लंबित प्रकरणों का प्रभावी निपटारा सुनिश्चित किया जा सके।


माननीय मुख्य न्यायाधिपति ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के बढ़ते महत्व पर भी सेमीनार में प्रकाश डाला तथा ई-साक्ष्य की अवधारणा, विशेष रूप से भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अंतर्गत इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों की ग्राह्यता पर चर्चा की। न्यायिक अधिकारियों को डिजिटल साक्ष्य से संबंधित वैधानिक प्रावधानों से भली-भांति परिचित रहने की सलाह दी गई।


अपने उद्बोधन के समापन में माननीय मुख्य न्यायाधिपति ने विश्वास व्यक्त किया कि यह सेमीनार प्रतिभागियों के ज्ञान एवं कौशल को समृद्ध करेगा तथा न्यायिक कार्यों में आने वाली चुनौतियों के समाधान हेतु व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान करेगा। माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय ने पुनः यह प्रतिपादित किया कि न्यायपालिका की शक्ति उसकी दक्षता, निष्पक्षता एवं न्याय के प्रति अटूट प्रतिबद्धता में निहित है तथा न्यायिक अधिकारियों की भूमिका विधि के शासन को सुदृढ़ करने एवं जनता के विश्वास को बनाए रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।


कार्यक्रम में प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, दुर्ग ने स्वागत भाषण दिया, जिसमें उन्होंने निरंतर न्यायिक शिक्षा और विचारों के आदान-प्रदान के महत्व पर जोर दिया। इसके बाद निदेशक, छत्तीसगढ़ राज्य न्यायिक अकादमी, बिलासपुर ने परिचयात्मक भाषण दिया, जिसमें उन्होंने सेमीनार के उद्देश्यों की रूपरेखा प्रस्तुत की और बदलते कानूनी परिदृश्य में क्षमता निर्माण की बढ़ती आवश्यकता पर बल दिया। उद्घाटन सत्र का समापन दुर्ग के द्वितीय जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा धन्यवाद प्रस्ताव के साथ हुआ।


सेमीनार का एक महत्वपूर्ण और निर्णायक क्षण "मध्यस्थता 2.0 IAISAGR - दुर्ग के लिए मध्यस्थता रणनीति मॉडल" नामक प्रकाशन का विमोचन था, जिसका अनावरण माननीय मुख्य न्यायाधिपति के हाथों हुआ। उनकी गरिमामय उपस्थिति में मध्यस्थता पर इस महत्वपूर्ण कृति के विमोचन ने कार्यक्रम को एक विशिष्ट आयाम प्रदान किया और सौहार्दपूर्ण विवाद समाधान के प्रतिन्यायपालिका की प्रगतिशील प्रतिबद्धता का प्रतीक बना।


आयोजित सेमीनार में कुल 92 न्यायिक अधिकारियों ने सहभागिता की। कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों द्वारा विभिन्न महत्वपूर्ण विधिक विषयों पर प्रस्तुतिकरण दिए गए, जिनमें आदेश 7 नियम 10 एवं नियम 11, सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत न्यायालय की अधिकारिता एवं वादपत्र निरस्तीकरण की शक्ति, निष्पादन प्रकरणों के शीघ्र निराकरण हेतु रणनीतियाँ, धारा 138 परक्राम्य लिखत अधिनियम के प्रकरणों के निपटारे हेतु तकनीक एवं उपाय, धारा 351 बी.एन.एस.एस. के अंतर्गत अभियुक्त के परीक्षण का उद्देश्य, ग्राह्यता एवं साक्ष्य मूल्य, तथा ई-साक्ष्य का अवलोकन एवं धारा 63 के अंतर्गत उसके वैधानिक प्रावधान जैसे विषय शामिल रहे। सेमीनार का उद्देश्य न्यायिक अधिकारियों के ज्ञान एवं कौशल में अभिवृद्धि करना तथा न्यायिक प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी एवं समयबद्ध बनाना रहा।


आयोजित सेमीनार में नवीन आपराधिक कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन एवं न्यायिक अधिकारियों की दक्षता वृद्धि के उद्देश्य से एक रिफ्रेशर कोर्स का आयोजन किया गया, जिसमें जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश, चतुर्थ एफ.टी.एस.सी. (पॉक्सो), दुर्ग द्वारा भारतीय न्याय संहिता के प्रावधानों पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला गया। वहीं, व्यवहार न्यायाधीश कनिष्ठ श्रेणी, धमधा द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के विभिन्न पहलुओं की विस्तृत जानकारी प्रदान की गई।


कार्यक्रम में उपस्थित न्यायिक अधिकारियों को नवीन आपराधिक कानूनों की महत्वपूर्ण धाराओं, उनके व्यावहारिक अनुप्रयोग तथा न्यायिक प्रक्रियाओं में आए बदलावों से अवगत कराया गया। सेमिनार के दौरान प्रतिभागियों ने सक्रिय सहभागिता करते हुए विषय से संबंधित जिज्ञासाओं का समाधान भी प्राप्त किया। इस कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल, रजिस्ट्री के अधिकारीगण तथा दुर्ग, बालोद, बेमेतरा, कवर्धा एवं राजनांदगांव जिलों के न्यायिक अधिकारीगण उपस्थित रहे।

CNI NEWS कवर्धा छत्तीसगढ़ से अनवर खान की रिपोर्ट

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