जिला सिवनी मध्यप्रदेश
सच्ची गुरु दक्षिणा अपने जीवन को पवित्र बनाना --- निर्वेग़ साग़र जी,
सी एन आई न्यूज सिवनी/ लखनादौन
मुनि श्री १०८ निर्वेगसागर जी महाराज निर्वेगसागर जी महाराज ने विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए उत्तम संयम धर्म का अत्यंत प्रेरणादायी एवं गहन विवेचन किया
मुनिश्री ने उत्तम संयम धर्म के बारे में समझाया कि इन दस दिनों में आपने जो कठिन साधनाएँ की हैं, वे इस बात का प्रमाण हैं कि मनुष्य में अद्भुत संकल्प शक्ति है
इसलिए प्रश्न यह नहीं कि “मैं कर सकता हूँ या नहीं?”
प्रश्न यह है कि “मैंने दृढ़ संकल्प किया है या नहीं?”
दशलक्षण के ये दस दिन समाप्त होने के बाद भी संयम की इस साधना को जीवन में आगे बढ़ाना ही इस पर्व की वास्तविक उपलब्धि होगी
संसार की असारता से संयम की ओर
संसार में जिसे हम सुख का कारण मानते हैं, वही अनेक बार दुःख और बंधन का कारण बन जाता है। भोग, परिग्रह और आसक्ति मनुष्य को संसार में बाँधे रखते हैं। जब जीव को संसार की वास्तविकता का बोध होता है, तब उसके भीतर वैराग्य और संयम की भावना जागती है
इन दस दिनों की साधना में अनेक श्रावक-श्राविकाएँ उपवास, एक समय भोजन, रात्रि भोजन का त्याग, रात्रि में पानी का त्याग, मौन, पदयात्रा तथा विभिन्न नियमों का पालन कर रहे हैं
संयम में जो आनंद है, वह असंयम में नहीं
संयम केवल बाहरी नियम नहीं
संयम का अर्थ केवल भोजन का त्याग करना नहीं है। हमें जीवन में
वाणी का संयम
इन्द्रिय संयम
मन का संयम
विचारों का संयम
राग-द्वेष का संयम
परिग्रह का संयम धारण करना
मुनिश्री ने समझाया कि मन सबसे अधिक चंचल है। इसलिए शरीर को संयमित करने के साथ मन को भी शुद्ध दिशा में लगाना आवश्यक है।
मोबाइल और मन का संयम
आज मोबाइल हमारे जीवन का हिस्सा बन गया है। उसी मोबाइल पर गुरु की वाणी और जैनवाणी सुनी जा सकती है, लेकिन उसी पर ऐसी सामग्री भी उपलब्ध है जो मन में राग, द्वेष और विकार बढ़ा सकती है।
इसलिए स्वयं से पूछें—
हम अपने मोबाइल का उपयोग आत्मकल्याण के लिए कर रहे हैं या मन को और अधिक चंचल बनाने के लिए
गुरु को हमारा धन, संपत्ति या वैभव नहीं चाहिए।गुरु चाहते हैं कि हम अपने जीवन की बुराइयाँ, अवगुण और असंयम उनके चरणों में छोड़ दें।
यदि कोई व्यक्ति लाखों रुपये दान कर दे, लेकिन अपने जीवन में संयम के लिए तैयार न हो, तो गुरु की अपेक्षा पूरी नहीं होती।
सच्ची गुरु-दक्षिणा है—अपने जीवन को संयमित और पवित्र बनाना
मुनिश्री ने युवा दंपत्ति द्वारा संयम एवं ब्रह्मचर्य के संकल्प का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि ऐसे संकल्प ही गुरु के हृदय को वास्तविक प्रसन्नता देते हैं।
मनुष्य जीवन — संयम का दुर्लभ अवसर
मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है। इस जीवन में हमें संयम, साधना और आत्मकल्याण का अवसर मिला है। इसलिए इस अमूल्य जीवन को केवल भोगों और विषयों में व्यर्थ नहीं करना चाहिए।उसी प्रकार संयम की मर्यादा में चलने वाला जीवन अपने वास्तविक लक्ष्य की ओर बढ़ता है। यदि जीवन से संयम के तट हट जाएँ तो मनुष्य दिशाहीन हो सकता है
दशलक्षण महापर्व केवल दस दिनों का पर्व नहीं, बल्कि जीवन की दिशा बदलने का अवसर है जो संयम इन दिनों में अपनाया है उसे पर्व समाप्त होने के साथ समाप्त न करें
थोड़ा कम बोलें।
वाणी को मधुर बनाएँ।
इन्द्रियों पर नियंत्रण रखें।
रात्रि भोजन जैसे त्यागों को यथाशक्ति जीवन में आगे बढ़ाएँ।मोबाइल और समय का सदुपयोग करें।
मन को जैनवाणी और गुरु-वाणी में लगाएँ।
अपने अवगुण गुरु के चरणों में छोड़ने का संकल्प लें।
असंयम को छोड़ो, संयम को अपनाओ और दृढ़ संकल्प के साथ अपने दुर्लभ मानव जीवन को आत्मकल्याण की दिशा में लगाओ
जिला ब्यूरो छब्बी लाल कमलेशिया की रिपोर्ट


















No comments:
Post a Comment
Please do not enter any spam link in the comment box.