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Wednesday, October 21, 2026

हर साल रावण जलता है, फिर भी रामराज्य क्यों नहीं आता? एक चाचा का तीखा व्यंग्य, समाज के नाम!

 हर साल रावण जलता है, फिर भी रामराज्य क्यों नहीं आता?



एक चाचा का तीखा व्यंग्य, समाज के नाम!             सी एन आइ न्यूज पुरुषोत्तम जोशी।


 कल धूमधाम से संपन्न हुआ विजयादशमी पर्व,  दशहरे की रात थी, रावण का विशाल पुतला जल चुका था। चारों तरफ आतिशबाजी का धुआँ था, लोगों के चेहरों पर उत्सव की खुशी थी और मैदान में रावण के जले हुए अवशेष बिखरे पड़े थे। तभी उन अवशेषों के पास बैठे एक चाचा ने गहरी साँस लेते हुए ऐसा सवाल उठाया कि आसपास खड़े लोग सोचने पर मजबूर हो गए।



चाचा बोले, “भाई साहब! एक बात मेरी समझ में आज तक नहीं आई। हर साल हम बड़े धूमधाम से रावण जलाते हैं। कहीं दस लाख का पुतला बनता है, कहीं करोड़ों रुपये आतिशबाजी में उड़ जाते हैं। 




नेता जी भाषण देते हैं, मंच से बुराई पर अच्छाई की जीत के नारे लगते हैं और हम सब तालियाँ बजाकर घर लौट आते हैं। लेकिन अगले दिन से वही पुरानी कहानी शुरू हो जाती है। आखिर रामराज्य आता क्यों नहीं?”


चाचा कुछ देर रुके, फिर बोले, “हमने रावण के दस सिर तो हर साल जला दिए, लेकिन अपने भीतर बैठे काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और भ्रष्टाचार के सिरों को कभी हाथ तक नहीं लगाया। पुतला जलाने में सबको रुचि है, मगर अपने अंदर की बुराइयों को जलाने में किसी की दिलचस्पी नहीं!”


फिर चाचा ने समाज की ओर इशारा करते हुए कहा, “परिवार में देख लो, भाई-भाई से लड़ रहा है, बेटा माता-पिता को बोझ समझ रहा है, रिश्तों में प्रेम की जगह स्वार्थ ने ले ली है। समाज में देख लो, ईमानदार आदमी परेशान है और बेईमान आदमी सम्मानित। झूठ बोलने वाला चतुर कहलाता है और सच बोलने वाला मूर्ख। फिर हम किस मुँह से रामराज्य की कल्पना करते हैं?”


चाचा का व्यंग्य अभी बाकी था।


“देश की बात करें तो भ्रष्टाचार पर भाषण देने वाले खुद भ्रष्टाचार में डूबे मिल जाते हैं। दूसरों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले अपने फायदे के लिए सारे नियम भूल जाते हैं। धर्म के नाम पर भीड़ जुटाना आसान है, लेकिन  धर्म के रास्ते पर खुद चलना मुश्किल है,जै श्रीराम का नारा लगाना आसान है, लेकिन श्रीराम के आदर्शो को जीवन में उतारना कठिन है।                   चाचा ने रावण की राख की ओर देखते हुए कहा, मुझे तो लगता है कि रावण हर साल जलता नहीं, बल्कि अगले साल दहन के लिए तैयार हो जाता है।               अंत में उन्होंने एक बात कही कि रावण दहन की सार्थकता तभी है,जब बुराईयों का दहन हमारे आचरण में भी दिखाई दे। क्योंकि रामराज्य मैदान में रावण जलाने से नहीं, अपितु अपने जीवन में राम के आदर्श अपनाने से आएगा।

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