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Friday, March 13, 2026

श्रीमद्भागवत कथा में श्रीकृष्ण जन्म पर झूम उठे श्रद्धालु

 श्रीमद्भागवत कथा में श्रीकृष्ण जन्म पर झूम उठे श्रद्धालु



अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट 


जांजगीर चाम्पा - भगवान विष्णु के आठवें अवतार के रूप में श्रीकृष्ण ने भादों मास के कृष्ण पक्ष में अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र के अंतर्गत वृष लग्न में अवतार लिया। श्रीकृष्ण की उपासना को समर्पित भादों मास विशेष फलदायी कहा गया है। भाद अर्थात कल्याण देने वाला , 




कृष्ण पक्ष स्वयं श्रीकृष्ण से संबंधित है , इसमें अष्टमी तिथि पखवाड़े के बीच संधि स्थल पर आती है। रात्रि योगीजनों को प्रिय है और उसी समय श्रीकृष्ण धरा पर अवतरित हुये। श्रीमद्भागवत कथा में उल्लेख आया है कि श्रीकृष्ण के जन्म का अर्थ है अज्ञान के घोर अंधकार में दिव्य प्रकाश। अर्थात जीव को संसार का आकर्षण खींचता है , उसे उस आकर्षण से हटाकर अपनी ओर आकर्षित करने के लिये जो तत्व साकार रूप में प्रकट हुआ , उस तत्व का नाम श्रीकृष्ण है। जिन्होंने अत्यंत गूढ़ और सूक्ष्म तत्व अपनी अठखेलियों , अपने प्रेम और उत्साह से आकर्षित कर लिया , ऐसे तत्वज्ञान के प्रचारक , समता के प्रतीक भगवान श्रीकृष्ण के संदेश , उनकी लीला और उनके अवतार लेने का समय सब कुछ अलौकिक है।

                                 उक्त बातें मां शंवरीन दाई की पावन धरा अमोरा (महन्त) के नवा तालाब पारा में स्थापित पंचमुखी हनुमानजी की असीम कृपा से आयोजित संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा के पंचम दिवस कथा व्यास दीदी हेमलता शर्मा (पाली - कोरबा निवासी) ने श्रोताओं को  कथा सुनाते हुये कही। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण जन्म का सारगर्भित कथाश्रवण कराते हुये श्रोताओं को बताया कि भगवान रोते हुये नही बल्कि मुस्कराते हुये अवतरित हुये। जन्म-मृत्यु के चक्र से छुड़ाने वाले जनार्दन के अवतार का समय था निशीथ काल , चारों ओर अंधेरा पसरा हुआ था। ऐसी विषम परिस्थितियों में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ कि मां-बाप हथकडियों में जकड़े हैं , चारों तरफ कठिनाईयों के बादल मंडरा रहे हैं। इन सभी परेशानियों के बीच भी भगवान श्रीकृष्ण मुस्कराते हुये अवतरित हुये। श्रीकृष्ण ने अपने भगवान होने का संकेत जन्म के समय ही दे दिया। कारागार के ताले खुल गये , पहरेदार सो गये और आकाशवाणी हुई कि इस बालक को गोकुल में नंद गोप के घर छोड़ आओ। भीषण बारिश और उफनती यमुना को पारकर शिशु कृष्ण को गोकुल पहुंचाना कोई मामूली काम नहीं था। वसुदेव ने जैसे ही यमुना में पैर रखा , पानी और ऊपर चढ़ने लगा। श्रीकृष्ण ने अपना पैर नीचे की तरफ बढ़ाकर यमुना का स्पर्श किया तब यमुना शांत हुई और कृष्णजी गोकुल पहुँचे। इसके पहले कथाव्यास द्वारा आज श्रद्धालुओं को श्रीराम कथा और अम्बरीश कथा का भी रसपान कराया गया। कथा में प्रतिदिन प्रसंग के अनुसार से दिव्य झांकी भी निकाली जा रही है।


गौरक्षक सेवा समिति का व्यासपीठ से हुआ सम्मान


संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा (09 मार्च से 16 मार्च) के पंचम दिवस सियाराम धर्म गौरक्षक सेवा समिति के सदस्यों द्वारा आज रात्रिकालीन भोजन प्रसाद का व्यवस्था किया गया। उनकी इस अनुकरणीय कार्य के लिये कथा व्यास दीदी हेमलता शर्मा ने मंच से सभी गोभक्तों को दुपट्टा देकर उनका सम्मान किया। यह आध्यात्मिक अनुष्ठान श्रद्धा , भक्ति , ज्ञान और वैराग्य की दिव्य अनुभूति का माध्यम बना। इस दौरान कथा व्यास ने अपने साक्षात अमृतमयी वचनों के माध्यम से श्रीमद्भागवत की गूढ़ शिक्षाओं को सरल एवं भावपूर्ण रूप में प्रस्तुत किया। प्रसाद भंडारा को लेकर भक्तों का उत्साह अभूतपूर्व रहा , जिसमें गांव के साथ - साथ आसपास के दर्जनों गांवों से आये हुये पुरुष , महिलाओं और बच्चों सहित सैकड़ों श्रद्धालुओं ने बड़े ही श्रद्धा भाव से भोजन प्रसाद ग्रहण किया। सभी भक्तों के बीच सेवा और सहभोज का अद्भुत दृश्य देखने को मिला — जो एक सच्चे आध्यात्मिक समाज की झलक प्रस्तुत करता है। संपूर्ण आयोजन में स्थानीय नागरिकों , सेवाव्रती भाई-बहनों और कथा आयोजन समिति का सहयोग अत्यंत सराहनीय रहा। कथा का उद्देश्य केवल धर्म श्रवण नहीं बल्कि कर्म , सेवा और परस्पर प्रेम का संवर्धन रहा — और इस उद्देश्य की पूर्ति कथा एवं भंडारे दोनों में सफलतापूर्वक हुई। गौरक्षक सेवा समिति के सक्रिय सदस्य ने कहा कि कथा श्रवण के बाद भंडारे में शामिल होने से मन को शांति और आध्यात्मिक संतोष की प्राप्ति होती है।‌ समिति के सदस्यों और ग्रामीण युवाओं ने सेवा भाव से व्यवस्था सम्हाली ताकि किसी भी श्रद्धालु को असुविधा ना हो। यह आयोजन धर्म , भक्ति और सामाजिक एकजुटता का एक सुंदर दृश्य प्रस्तुत करते है। इन आयोजनों का उद्देश्य भगवान की भक्ति के साथ-साथ समाज में सेवा भाव को बढ़ावा देना है। इसमें दुर्गेश साहू (अध्यक्ष) , चंद्रहास साहू (उपाध्यक्ष) , प्रदीप कश्यप (कोषाध्यक्ष) , धरमपाल साहू (सचिव) , आशीष , क्रांति , भूपेन्द्र , रामेश्वर , दीनदयाल , राघवेन्द्र , मुकेश , शिवा , राकेश , तेरस , श्रवण और जयसिंह का सराहनीय योगदान रहा।कथा आयोजन समिति ने सभी श्रद्धालुओं , सत्संग प्रेमियों , दानदाताओं और सेवा करने वाले सभी महानुभावों का सादर आभार व्यक्त किया है।

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