36 से अधिक ऐप, 19 विषयों की जानकारी और अनगिनत ऑनलाइन जिम्मेदारियां... आखिर बच्चों को पढ़ाएगा कौन?
डिजिटल रिपोर्टिंग और सर्वे के बोझ तले दबता शिक्षक, शिक्षकों ने उठाई व्यवस्था में बदलाव की मांग
साल्हेवारा==शिक्षा व्यवस्था को डिजिटल और आधुनिक बनाने की पहल अपनी जगह उचित है, लेकिन जब एक शिक्षक का अधिकांश समय बच्चों को पढ़ाने के बजाय तरह-तरह के ऐप, पोर्टल, ऑनलाइन एंट्री और सर्वे कार्यों में बीतने लगे, तो शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
शिक्षकों की व्यथा है कि वर्तमान में उन्हें लगभग 36 प्रकार के ऐप और पोर्टल पर अलग-अलग जानकारियां अपलोड करनी पड़ रही हैं। इनमें एमडीएम, वीएसके, दिव्यांग बच्चों की जानकारी, बीटीसी पाठ्यपुस्तक, गणवेश, खेलकूद, इको क्लब, नेलनार, छात्रवृत्ति पोर्टल, यू-डाइस, सीजी स्कूल, आधार एवं अपार आईडी, वीर गाथा, स्वच्छ भारत, वृक्षारोपण, पर्यावरण संरक्षण, सिंगल यूज प्लास्टिक सहित अनेक गतिविधियों की रिपोर्टिंग शामिल है।
इतना ही नहीं, विद्यालय की भौगोलिक स्थिति, जलवायु, पेयजल, किचन गार्डन, प्रार्थना सभा, मोर बिजली, स्वच्छता सप्ताह, चिरायु टीम, स्वास्थ्य विभाग, हाथीपांव एवं एल्बेंडाजोल जैसी गतिविधियों की जानकारी भी समय-समय पर ऑनलाइन दर्ज करनी होती है।
वहीं एफएलएन के अंतर्गत लगभग 19 विषयों की जानकारी, दो शिक्षकों से संबंधित विवरण, न्योता भोज, मध्यान्ह भोजन की संपूर्ण जानकारी, रसोइया एवं स्वीपर का रिकॉर्ड भी शिक्षकों की जिम्मेदारियों में शामिल है। इसके अतिरिक्त गांव-गांव में अलग-अलग सर्वे, समतुल्यता, साक्षर भारत, निपुण भारत अभियान जैसे कार्य भी लगातार संचालित होते रहते हैं।
शिक्षकों का कहना है कि इन तमाम जिम्मेदारियों के बीच पाठ्यक्रम पूरा करना, बच्चों का व्यक्तिगत शैक्षणिक मूल्यांकन करना, कमजोर विद्यार्थियों पर विशेष ध्यान देना और अभिभावकों से संवाद करना भी उन्हीं की जिम्मेदारी है। ऐसे में सवाल उठता है कि शिक्षक आखिर बच्चों को पढ़ाने के लिए समय कब निकालें?
शिक्षकों की मांग है कि डिजिटल व्यवस्था का विरोध नहीं, बल्कि अनावश्यक दोहराव वाली रिपोर्टिंग और गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ कम किया जाए। सभी पोर्टल को एकीकृत कर एक ही स्थान पर जानकारी दर्ज करने की व्यवस्था बने तथा विद्यालयों में आवश्यकतानुसार अलग डाटा एंट्री एवं प्रशासनिक सहयोग उपलब्ध कराया जाए।
शिक्षकों की पीड़ा का मूल सवाल यही है—शिक्षक को शिक्षक ही रहने दीजिए। यदि उसका पूरा समय ऐप, पोर्टल, सर्वे और आंकड़े जुटाने में ही निकल जाएगा, तो देश के भविष्य अर्थात बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कौन देगा?
अब समय आ गया है कि शिक्षा विभाग इस गंभीर विषय पर संवेदनशीलता से विचार करे और शिक्षकों को डिजिटल औपचारिकताओं के बोझ से मुक्त कर वास्तविक शिक्षण कार्य के लिए पर्याप्त समय दे।


















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