व्यापारियों की आवाज को मंच देने वाले मीडिया के प्रति हमारा सहयोगी भाव भी जरूरी
कभी त्योहारों पर व्यापारिक विज्ञापनों से भर जाते थे अखबारों के पन्ने, बदलते दौर में स्थानीय व्यापार और पत्रकारिता के संबंधों पर विचार जरूरी
कई वर्षों से व्यापारिक गतिविधियों और विभिन्न व्यापारिक संगठनों से जुड़े रहते हुए मैंने व्यापारियों के उतार-चढ़ाव, उनकी समस्याओं, सरकारी नीतियों के प्रभाव, बाजार की प्रतिस्पर्धा और व्यापार को आगे बढ़ाने के प्रयासों को करीब से देखा है।
व्यापारियों की समस्याओं और उनकी मांगों को शासन-प्रशासन तक पहुँचाने तथा व्यापार के हित में मुद्दों को उठाने के दौरान समाचार पत्रों, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और डिजिटल मीडिया की भूमिका भी लगातार देखने को मिली है। मीडिया ने अनेक अवसरों पर व्यापारियों की आवाज को समाज और संबंधित अधिकारियों तक पहुँचाने में सहयोग दिया है।
आज जब त्योहारों का मौसम है, तो मुझे पुराने समय की याद आती है, जब दीपावली और अन्य त्योहारों पर अनेक व्यापारी अपने प्रतिष्ठानों के आधे-आधे और पूरे पृष्ठ के विज्ञापन समाचार पत्रों में प्रकाशित करवाते थे। समय के साथ परिस्थितियाँ बदली हैं। ऑनलाइन बाजार, डिजिटल विज्ञापन, बड़ी कंपनियों की प्रतिस्पर्धा, कम होते व्यापारिक मार्जिन और प्रतिष्ठानों के बढ़ते खर्चों ने व्यापार करने के तौर-तरीकों को प्रभावित किया है। व्यापारी भी अपने खर्चों और कारोबार के बीच संतुलन बनाने के लिए विवश हैं।
लेकिन इसी के साथ एक विचार मेरे मन में आता है कि जिस मीडिया ने वर्षों तक व्यापारियों की आवाज को मंच दिया, व्यापारिक आयोजनों को स्थान दिया और बाजार की गतिविधियों को जनता तक पहुँचाया, उसके आर्थिक पक्ष और भविष्य के बारे में विचार करना भी क्या हमारी सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा नहीं होना चाहिए?
समाचार पत्र और अन्य मीडिया संस्थान भी समाचार संकलन, पत्रकारों एवं कर्मचारियों, तकनीक, मुद्रण और वितरण सहित अनेक खर्चों के साथ काम करते हैं। डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव के बीच मीडिया का विज्ञापन बाजार भी बदल रहा है। सभी संस्थानों की आर्थिक स्थिति एक जैसी नहीं है, लेकिन इस बदलाव को समझना जरूरी है।
मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। उसकी स्वतंत्रता, विश्वसनीयता और आर्थिक स्थिरता समाज के व्यापक हित से जुड़ी हुई हैं। व्यापारियों की समस्याओं को उठाने वाले इस माध्यम के प्रति सम्मान और सहयोग की भावना बनाए रखना हम सभी के लिए महत्त्वपूर्ण है।
मेरा यह विचार किसी व्यापारी पर विज्ञापन देने का दबाव बनाने या किसी मीडिया संस्थान की आर्थिक स्थिति के लिए व्यापारियों को जिम्मेदार ठहराने के उद्देश्य से नहीं है। व्यापारियों की अपनी आर्थिक सीमाएँ और व्यावसायिक आवश्यकताएँ हैं। मेरा आशय केवल इतना है कि जहाँ व्यापारिक दृष्टि से उपयोगी और संभव हो, वहाँ स्थानीय व्यापारी अपने शहर के समाचार पत्रों और अन्य मीडिया माध्यमों को भी विज्ञापन तथा प्रचार-प्रसार की अपनी योजनाओं में उचित स्थान देने पर विचार करें।
इसी प्रकार मीडिया संस्थानों को भी छोटे और मध्यम व्यापारियों की आवश्यकताओं के अनुरूप व्यावहारिक विज्ञापन योजनाएँ विकसित करनी चाहिए, ताकि दोनों पक्षों के बीच सहयोग बढ़ सके और स्थानीय व्यापार को भी अपने उत्पादों एवं सेवाओं के प्रचार का बेहतर अवसर मिल सके।
हमने हमेशा यह प्रयास किया है कि व्यापारियों की आवाज शासन-प्रशासन तक पहुँचे। अब यह विचार करना भी जरूरी है कि व्यापारियों की आवाज को समाज तक पहुँचाने वाले माध्यमों के साथ हम किस प्रकार सकारात्मक सहयोग बनाए रख सकते हैं।
मेरा विश्वास है कि मजबूत स्थानीय व्यापार और जिम्मेदार, स्वतंत्र तथा आर्थिक रूप से टिकाऊ स्थानीय पत्रकारिता एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं। अपने शहर के व्यापार, रोजगार और सामाजिक विकास के लिए हमें एक-दूसरे की भूमिका को समझते हुए साथ आगे बढ़ना चाहिए।
दीपक सेठी
व्यक्तिगत विचार;
जबलपुर (मध्य प्रदेश)
9826 162271


















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